हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पंद्रह अगस्त का उत्सव शानों शौकत से मनाया गया. झंडा फहराने के साथ-साथ भाईचारे, समानता आदि की बातें भी हुई. जो हमारे संविधान में भी लिखी हुई हैं. समता का अर्थ इस देश में स्त्री-पुरूष बिना किसी जातिगत, धार्मिक और आर्थिक भेदभाव के अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकते हैं और न्याय पा सकते हैं. उन्हें अपने विचार व्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी. ये सारे अधिकार अंग्रेजों के शासन काल में नागरिकों को उपलब्ध नहीं थे. आजादी मिलने के बाद देश में गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन की स्थिति थी. उस समय सरकार ने जनता को सबसे पहले राजनीतिक रूप से सक्षम बनाना चाहा. इसलिए मतदान के योग्य सभी स्त्री पुरुष को मतदान का अधिकार दिया. 21 वर्ष के सभी स्त्री पुरुष मतदान कर सकते थे. इस तरह भारत में महिलाओं को 1952 में ही मतदान का अधिकार मिल गया, जबकि स्विजरलैंड जैसे विकसित देश में महिलाओं को 1990 में मतदान का अधिकार मिला. लेकिन हाल की घटनाओं को देखकर यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकार महिलाओं को ये सारे अधिकार वास्तव में दे पायी है?
आजादी के बाद विचार अभिव्यक्ति का सबसे पहला मौका था गुप्त मतदान के द्वारा अपने इच्छित प्रतिनिधि को चुनकर लोकसभा तथा विधान समा में भेजना. प्रथम चुनाव के समय मतदान की उम्र को प्राप्त पुरुष और स्त्रियों की सूची बनाना चुनाव आयोग का मुख्य काम था. चुनाव आयोग को इसके लिए बहुत प्रयास करना पडा, क्यों कि अधिकांश महिलाएं अपने को पुरुष के नाम से ही पहचाने जाने की आदी थी. उन्हें अपना नाम तक पता नहीं था. मतदाता सूचि में तो उनको एक आजाद नागरिक की तरह अपने नाम को दर्ज करना था. चुनाव आयोग को महिलाओं को नाम दर्ज करवाने में बहुत प्रयास करना पड़ा. उनका लक्ष्य था अधिक से अधिक महिलाओं का नाम मतदाता के रूप में दर्ज हो. कहा जाता है कि इतने प्रयासों के बाद भी अठाइस लाख महिलाएं छूट गयीं थी.
चुनाव आयोग का प्रयास आगे के चुनावों में भी जारी रहा. धीरे-धीरे महिलाओं में चेतना आयी. उन्होंने अपना अस्तित्व को पहचाना और मतदाता सूचि में शामिल होती गई. 2019 के चुनाव तक यह काम पूरा हुआ. इसका अर्थ यह हुआ कि मतदाता के रूप में महिलाएं अपने राजनीतिक अधिकार को पुरुषों के बराबरा प्रयोग करने में सक्षम हुई. विचार अभिव्यक्ति की यह आजादी 2026 के जुलाई महीने में जंतर मंतर के छात्र आंदोलन के समय कुछ डवांडोल होता हुआ प्रतीत हुआ. या यों कहें कि झूठा साबित हुआ.
जुलाई महीने में दिल्ली के जंतर मंतर में छात्रों ने नीट परीक्षा पेपर लीक को लेकर आंदोलन किया. इस आंदोलन में लड़कों के साथ-साथ लडकियों ने भी हाथों में तरह तरह के नारे लिखे प्लेकार्ड लेकर बराबर की संख्या में भाग लिया छात्रों में गुस्सा था, हताशा थी. उन्होंने अपने हताशा और गुस्सा को अपने नारों में प्रकट किया. कुछ अपशब्द भी कहे गये जो उचित नहीं थे. लडकियां भी इसमें समान रूप से भागीदार थी. लेकिन जब आंदोलन समाप्त हुआ, लड़कियों के  मोबाइल पर उन्हें धमकियां दी जाने लगी, उन्हें रेप का डर दिखाया जाने लगा. उसे और परिवार के लोगों को जान से मार देने की धमकी दी जाने लगी. इस मानसिक प्रताडना से डर कर एक लड़की ने तो अपनी गलती की माफी मांग ली. उसने जो भी अपशब्द कहे या उसे गाली ही कह ले, वह गलती हो सकती है, अपराध नहीं. आजकल तो पूरी राजनीति ही गालियों की राजनीति हो गई है. इन नेताओं ने तो संसद को भी नहीं छोड़ा. वहां भी आये दिन अमर्यादित भाषा बोली जाती है. बच्चे उन्हीं का अनुसरण तो कर रहे हैं.
दूसरी बात यह है कि उसी तरह की गालियां लड़को ने भी दी लेकिन किसी को आपत्ति नहीं हुई . लड़कियां ही अपशब्द कहकर कुसंस्कारी हो गई, गुमराह हो गई. उसकी राह तो पहले से समाज ने बना दिया है. उसे क्या बोलना है, नहीं बोलना है, यह समाज ही निश्चित करेगा. उससे अलग तह कुछ भी बोलेगी उसे अपराधी और भटकी हुई कहा जायगा. राजनेताओं की भी यही सोच है. इसलिए लिए तो प्रधानमंत्री जी ने इन कुसंस्कारी, भटकी हुई बेटियों को माफ कर दिया. यहां पर तो कोई सजा या माफी का प्रश्न ही नहीं उठता है. क्यों कि यह कोई अपराध नहीं है. आंदोलन छात्रों के हितों के लिए था और दोनों की भागीदारी बराबर थी. यदि सजा देनी ही है तो दोनों, लडके और लड़कियों को दी जाय. लडकों के लिए अपशब्द कहना अपराध नहीं है तो लड़कियों के लिए भी नहीं है.
वे यह भूल जाते हैं कि कभी इन्हीं लड़कियों की नानियों, दादियों ने मतदाता सूची मे अपना नाम दर्ज करवाया था, क्योंकि सरकार उन्हें मत देकर अपना प्रतिनिधि चुनने में सक्षम मानती थी. लेकिन उन्हीं के बाद की पीढी की ये लड़किया भटकी, और गुमराह बन गईं. अब उन्हें पितृसत्ता के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री जी से शिक्षा ग्रहण करनी है और उनका क्षमा प्रार्थी बनना है. वास्तव में आंदोलन को नजरंदाज कर रहे प्रधानमंत्री जी यह बताना चाहते हैं कि इस तुच्छ आंदोलन में भाग लेकर भटकी हुई लडकियों को वे विशाल हृदय से क्षमा कर रहे हैं .
लड़के और लड़कियों को गैरबराबरी की नजरों से देखना सरकार के समानता के सारे दांवों को केवल एक झूठ साबित करता है. सारे आाजादी के उत्सवों, बडे बड़े वादे खोखले हैं, क्यों कि सरकार और समाज के मूल चरित्र में कोई अंतर नहीं आया है. वह अब भी पितृसत्तत्मक समाज ही है.

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