अभी-अभी भारत में दुर्गापूजा का उत्सव समाप्त हुआ है. तीन दिन तक दुर्गा की प्रतिमा लगाकर उसके शक्ति का गान होता रहा है और उसे महिशासुर को मारते हुए दिखाया गया है. पौराणिक कहानी यह है कि महिशासुर की क्रूरता से जब देवता आक्रांत थे तब वे दुर्गा की शरण में पहुंचे. शक्तिरूपा दुर्गा अवतरित हुई और उसने तीन दिन तक महिशासुर के साथ घोर युद्ध किया और दशमी के दिन उसे मार दिया. इसलिए उस दिन को विजय दशमी कहा गया. देवताओं को आपदा के समय महिला की ही याद आई और उसने अपने शक्ति के बल पर उनका उद्धार भी किया.
अब कुछ दिनों में दिवाली आने वाली है. दिवाली दीपों का पर्व होता है. इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है. नारकासुर ने देवताओं को अपनी ताकत से भयाक्रांत कर दिया था. तब उनको नरकासुर से बचाने के लिए शक्ति का अविर्भाव काली के रूप में हुआ. मां काली ने ही नरकासुर का वध कर देवताओं को बचाया. फिर वही महिला पुरुषों के बचाव में आती है.
शक्ति की कल्पना स्त्री के रूप में की गयी हैं तो निश्चित रूप से उस काल में स्त्री का स्थान समाज में पुरुष से ऊपर रहा होगा. इसीलिए देवता निसंकोच देवी की आराधना कर अपनी रक्षा के लिए उसे आह्वानित करते थे.
भारतीय समाज में आज स्त्री को कई रूपों में पहचाना जाता है. मां, बहन, पत्नी और बेटी, किसी भी रिश्ते में हो, .स्त्री पुरुष से नीचे के स्तर पर ही होगी. यानी, उसकी आज्ञा का पालन कर चलने वाली. विडंबना यही है कि आज भी वह मां, बहन, या पत्नी के रूप में कई तरह के निर्जला व्रत इसलिए करती हैं क्योंकि ऐसा करने से उसका पति, बेटा, या भाई दीर्घायु होगा और स्वस्थ्य रहेगा. महिलाओं के सारे पूजा-पाठ पुरुषों की भलाई के लिए ही होते हैं, वह अपने कल्यण के लिए कुछ नहीं कर सकती या वह यदि अपने बारे में सोचे और कुछ करे तो वह स्वार्थी हो जायगी.
वह घर को संभालती है, बच्चे पैदा करती है उन्हें पाल पोस कर बड़ा करती है. अब तो पढ़ लिख कर आर्थिक रूप से सक्षम हो कर पति को आर्थिक बल भी दे रही है. फिर भी स्थान तो पुरुष के बगल में नहीं, पीछे ही होगा. कहा जाता है भारत में औरत मांतुल्य होती है और उसकी पूजा होती है. व्यवहार में तो ऐसा दिखता नहीं है. उसको भोग की वस्तु समझा जाता है और बलात्कार जैसी घटनाओं के द्वारा उसका अपमान किया जाता है. उसे दोषी ठहराया जाता है.
दुख की बात तो यह है कि दुर्गापूजा, दिवाली जैसे त्योहारों के समय जब पंडालों में देवी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है तो उस समय घर की स्त्रियों को रसोईघर में स्थापित कर दिया जाता है. घर के अन्य सदस्यों के लिए तरह-तरह के पकवान बनाकर खिलाना ही उसका परम कर्तव्य हो जाता है. उसके उत्सव का वही तरीका होता है. भारत में तो कम से कम इन दो दिनों में महिलाओं को रसोई से छुट्टी देकर बाहर जाकर उत्सव मानाने का गौरव तो देना ही चाहिए.

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