औरतें मरती नहीं

बस चुप हो जाती हैं      

दीवरों के कानों में दबी आवाज बनकर                                

बंद अलमारियों में रखी पुरानी साडियों की सिलवटों                            

दरवाजों की चूल में अटकी किसी भूली सी आहट

वे बर्तनों की खनक में सांस लेती हैं

चैखट पर पड़े पायदान में

छोड जाती हैं अपना स्पर्ष

अपनी पीठ पर टंगे परिवार को

 पहाड़ चढ़ाते चढ़ाते खुद पहाड़ हो जाती हैं

पर मरती नहीं

वे मरकर भी पूरी तरह सो नहीं पाती

कब्र के अंधेरे में भी उनकी आंखे

हर परछाईं पर चैकसी रखती हैं

कोई अनहोनी तो नहीं हुई?

कोई भूखा तो नहीं सोया ?

कोई दरवाजा खुला तो नहीं रह गया ?

वो राख होकर भी जलती रहती है

गंगा में बहकर भी किनारे से बंधी रहती है

जैसे किसीने उन्हे मरने की इजाजत ही न दी हो

वे हर सुबह रोटियों की गोलाई में लौट आती हैं

हर शाम तुलसी के दीये में जल उठती है

वे पायल की छन – छन नहीं

 चुप्पी की गूंज बन जाती हैं


इतिहास गवाह है

जो साम्राज्य गिरे

जो नगर वीरान हुए

जो मोहल्ले उजड गए

उनकी औरते पहले ही मर चुकीं थी ।

Leave a Reply

Trending

Discover more from संभवा इंजोर

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading