15 दिसंबर को आयुष डॉक्टरों को सर्टिफिकेट बांटते समय बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने जिस तरह से एक महिला डॉक्टर के चेहरे से नकाब खींचा यह बेहद ही शर्मनाक है. यह किसी महिला के मर्यादा और उसके संवैधानिक अधिकार पर हमला है. मुख्यमंत्री को अपनी इस कार्रवाई के लिए माफी मांगना चाहिए.
हमारा संविधान औरतों को यह अधिकार देता है कि वह अपने पसंद के कपड़े पहन सकती हैं, अपने धर्म के हिसाब से कपड़े पहन सकती हैं, लेकिन नीतीश कुमार के इस व्यवहार के बाद भाजपा के नेताओं का बयान जिस तरह से सामने आ रहा है,चाहे वो गिरिराज सिंह का हो, चाहे वो भाजपा उत्तर प्रदेश के मंत्री संजय निषाद का हो, उनके बयान यह दिखा रहे हैं कि औरतों को भाजपा के लोग भोग की वस्तु समझते हैं या फिर इस बहाने पूरे देश में और पूरे बिहार में सांप्रदायिक नफरत फैलाना चाहते हैं.
इस्लामोफोबिया से ग्रस्त यें लोग मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. हम महिलाएं इन बयानों के खिलाफ खड़ी है. हम लोग यह समझते हैं कि औरत चाहे जो भी कपड़ा पहने, वह बुर्का पहने या साड़ी पहने, जींस पहने या स्कर्ट पहने, यह उसकी अपनी पसंद है का मामला है. उसके पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए. इसमें नुसरत को शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है, न बिहार की महिलाओं के शर्मिंदा होने की जरूरत. शर्मिंदा तो बिहार के मुख्यमंत्री को होना चाहिए. नुसरत एक कामकाजी महिला है. उसे डॉक्टर का रोल निभाना है. कामकाजी महिला के अधिकार पर यह जो हमला है, इस पर देश के सर्वोच्च न्यायालय से अपील हो कि वह स्वयं संज्ञान ले और एक इस पूरे मामले में महिलाओं के संविधान द्वारा प्राप्त अधिकार पर हमला करने वाले मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई हो. जरूरत इस बात की भी है कि देश के नागरिक सामने आए और इस महिला के पक्ष में खड़े हांे.
औरत का सम्मान खिलवाड करने की चीज नही है, यह बात संवैधानिक पद पर बैठे सत्ता  के लोग समझ पाये हैं, न कोर्ट. पितृसत्तात्मक समाज के आम लोगों से तो यह अपेक्षा ही नहीं की जा सकती है. दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्नाव बलात्कार के दोषी कुलदीप सिंह सेंगर को सशर्त बेल दे दिया है. उसका मानना है कि कुलदीप  सेंगर एक विधायक है, इसलिए  वह एक जन सेवक नही है. जन सेवक नही होने के कारण पॉस्को  केस मे एक आम दोषी की तरह उसे भी सात साल की ही सजा मिलेगी. पहले उसे एक जन सेवक मान कर आजीवन कारावास की सजा दी गई  थी. पुनः निरीक्षण  मे वकीलों ने यह साबित कर दिया कि पास्को  कानून में विधायक को जनसेवक नही माना गया है, इसलिए सेंगर को, जो तब तक सात वर्ष की सजा काट चुका था, बेल मिल गई.
इस तरह सेंगर हो या बिलकिस बानो के बलात्कार के दोषी लोग, बाहर आकर फिर अपराध नही करेंगे इसकी कोई गारंटी तो नही है. ऐसी परिस्थियों में भारत की महिलाओं के पास कौन सा रास्ता बचेगा. क्या  वे दक्षिण अफ्रीका की महिलाओं से सीख लंे?
दक्षिण अफ्रीका मे आज कल महिला हिंसा की घटनाएं बहुत बढ गई हैं. रेप पीडिताओं ने जब देखा कि सामान्य सी सजा काट कर लौटे दोषी फिर से वही काम कर रहें हैं, तो महिलाओं ने निश्चय किया कि वे बंदूक चलाना सीख कर खुद की रक्षा करेंगी और दोषियों को भी सजा देंगी. वे अब बंदूक चलाने की ट्रेनिंग ले रही हैं.
भारत जैसे शांतिप्रिय तथा अहिंसा के पुजारी देश मे क्या महिलाओं के लिए यह सहज और संभव है?

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