विश्वभर की महिलाएं एक लंबी लड़ाई लड रही है. यह लडाई है व्यवस्था के विरुद्ध अपने अस्तित्व को बचाने की और अपने अधिकारों को पाने की, क्योंकि मानव होने के कारण जो अधिकार हमें सहज रूप से प्राप्त है उनसे भी हमें वंचित किया जाता है. हमें न जीने का अधिकार है और न बोलने का और न हमारे साथ हो रही हिंसा का प्रतिरोध करने का अधिकार है . वर्तमान में हमें जो भी अधिकार मिले हुए हैं उनको हमने लड़कर ही प्राप्त किया है. अपने हकों की लड़ाई लड़ते हुए हमें लगभग सवा सौ साल हो चुके हैं. हमें कई सफलताएं भी मिलों. लेकिन पुरुष प्रधान समाज कभी भी यह स्वीकार नहीं कर पाता है कि महिलाएं कमजोर नहीं है. महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर उन सारे कामों को किया जिनको केवल पुरुषों के काम समझे जाते थे. महिलाएं ने सेना में लड़ाइयां लड रही है. बड़े-बडे व्यापरिक प्रतिष्ठानों में काम कर उन्होंने अपना लोहा मनवाया है. शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी सेवाओं के लिए महिलाओं को ही अनुकूल समझा जाता है. फिर क्या बात है कि महिलाएं अभी भी पुरुषों से कमतर समझी जाती हैं और उन्हें पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है. उसे आज भी पुरुष हिंसा का शिकार होना पड़ता है.
समय परिवर्तन के साथ महिला हिंसा के तरीकों में बदलाव भी देखे गये हैं. उसके तन के साथ साथ उसके मन मस्तिष्क को भी घायल किया जाता है और उसके सम्मान को चोट पहुंचाया जाता है. अब महिला उत्पीडन का नया क्षेत्र बन गया है डिजिटल वर्ल्ड. इस मायावी दुनियां में भी औरत को निशाना बनाया जाता है उसे डराया जाता है, धमकाया जाता है.
इन परिस्थितियों में यही कहा जा सकता है कि महिलाओ की यह लड़ाई उस समय तक चलेगी जबतक कि समाज की पुरुष मानसिकता में बदलाव नहीं आ जाती. इसलिए इस अंतहीन लडाई में महिलाएं शांतिपूर्ण ढंग से लगी हुई है और लगी रहेंगी. महिला उत्पीडन की इस लड़ाई में संभवा समूह ने अपना सहयोग देने के लिए ‘संभवा इंजोर ‘ नामक एक डिजिटल पत्रिका निकालने का निश्चय किया है. इसके द्वारा हमारा प्रयास रहेगा कि एक महिला की बात दूसरी महिला तक पहुंचायें. महिलाएं मुखर हों और महिला आंदोलन को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाये. हम चाहते हैं कि देश भर में ही नहीं विश्व के किसी भी कोने में होने वाले महिला आन्दोलनों की रिपोर्ट हम इसमें ला सके. इस पत्रिका को पढ़ने वाली प्रत्येक महिला से यह आशा की जायेगी कि वे अपनी जगह पर महिला उत्पीडन के विरुद्ध की जानेवाले कार्यक्रमों की रिपोर्ट हम तक जरूर पहुंचायेंगी. इसके अलाव इस पत्रिका में महिलाओं से संबंधित लेख, कहानियां और कविताओं को भी सम्मिलित किया जायगा.
कुछ वर्ष पूर्व तक हम ‘संभवा इंजोर ‘ नामक एक पाक्षिक पत्रिका निकालते थे. इसका संपादन का काम कनक करती थी. कनक हमें छोडकर चली गयी. पत्रिका को तो बंद होना ही था. अब इस पत्रिका को डिजिटल रूप में ही सही निकालकर हम एक बार फिर कनक के प्रयासों को जीवित करना चाहते हैं. आशा है हमारे प्रयास से संभावनाओं का यह आलोक हमारी लडाई को आगे बढ़ायेगा.

‘संभवा इंजोर’ का पुनः डिजिटल प्रकाशन
विश्वभर की महिलाएं एक लंबी लड़ाई लड रही है. यह लडाई है व्यवस्था के विरुद्ध अपने अस्तित्व को बचाने की और अपने अधिकारों को पाने की, क्योंकि मानव होने के कारण जो अधिकार हमें सहज रूप से प्राप्त है उनसे भी हमें वंचित किया जाता है. हमें न जीने का अधिकार है और न बोलने…
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