प्रिय,
मुझे लगता है कि मैं फिर से पागल हो रही हूं। मुझे नहीं लगता कि हम उस मुश्किल भरे वक्त से फिर से गुज़र पाएंगे। मैं इस बार रिकवर नहीं हो पाऊंगी। मुझे तरह-तरह की आवाजें आने लगी हैं और मैं किसी चीज़ पर ध्यान नहीं लगा पा रही हूं। इस समय मैं वही कर रही हूं जो मुझे सबसे ज्यादा सही लग रहा है।
तुमने मुझे वो सब खुशियां दी हैं जो संभव थीं। तुम हर तरह से वो सब कुछ करते थे, जो तुम कर सकती थे। जब तक यह बीमारी नहीं आई थी, तब तक हम दोनों की जिंदगी एक हसीन ख्वाब जैसी थी।  मैं अब और नहीं लड़ सकती। मुझे पता है कि मैं तुम्हारी जिंदगी खराब कर रही हूं।
देखो मैं ये भी ढंग से नहीं लिख पा रही हूं। मैं पढ़ नहीं पा रही हूं। अपनी जिन्दगी की सारी खुशियों का श्रेय मैं तुमको देती हूं। तुम मेरे साथ हमेशा धैर्य रखते हो। मैं यह कहना चाहती हूं कि सब लोग इसे जानते हैं कि अगर किसी ने मुझे बचाया होता, तो वो तुम ही होते। मुझसे सब कुछ छूटता चला गया एक तुम्हारी अच्छाइयों को छोड़। मैं अब तुम्हारी जिन्दगी और खराब नहीं कर सकती। मुझे नहीं लगता कि दो लोग कभी इतना खुश रह सकते हैं एक साथ, जितने  हम-तुम रहे।
-वर्जीनिया वुल्फ
सोचती हूं दुनिया को इतना प्रेम करने वाले लोग दुनिया से इस तरह कैसे विदा हो जाते हैं। तुमनें अपने खत में लिखा कि मुझे नहीं लगता दो लोग कभी इतना खुश रह सकते हैं साथ , जितने हम – तुम रहे। क्या मौत इतना अज़ीज़ है कि जिन्दगी को विदा कह दिया जाय। मैं शायद तुम्हें समझ सकती हूं। मैं बहुत से ऐसे लोगों को जानती हूं जो दुनिया से मुहब्बत करते हैं और दुनिया से हार जाते हैं। मैंने भी अपना दोस्त खोया है। राणा बनर्जी। तुम होती तो उसकी आवाज के जादू में बंध जाती। उसके स्वर पहाड़ों से गिरते झरने की तरह थे। या उमड़ती घटाओं की तरह। बिजली सी कंपन थी आवाज में। मैं उसे अक्सर सुनती। हमारा जन गायक एक दिन गंगा नदी में हमेशा के डूब गया।  लहरों ने उसे थपकियां देखकर सुला दिया। गंगा से उठाकर उसे घर लाया गया था। उसका चेहरा, उसकी गहरी आंखें , उसकी गर्दन, उसके घने बाल सब कुछ मुझे याद है। उसकी आवाज आज भी कानों में गूंजती है।
मौत और जिन्दगी के बीच बहुत फासला नहीं होता। मैं जानती हूं हम सब की जिन्दगी में अवसाद के रंग है। कभी- कभी जीवन से विरक्ति होती है। या फिर मौत बार – बार दोस्त की तरह गले लगाती है। मेरे मन में भी कई बार ये ख्याल आया। कई बार गंगा नदी के मुहाने से लौट आई। समुद्र में  जाते हुए  खुद को लहरों के साथ बहने दिया।  पानी खींचता है मुझे। पास बुलाता है। मैं नदी के किनारे पांव डाल सोचती रही कि हमेशा के लिए समां  जाएं। पर कई जोड़ी आंखें पुकारती रही मुझे। बच्चे की डूबती आवाज मुझे वापस ले आती है। मां की उदास आंखें पुकारती है। काश तुम्हें भी किसी की आंखें लौटा लाती।  कोई आवाज देता तुम आ जाती।
तुम्हें पढ़ते हुए मैं तमाम मौसम को याद करती हूं। इस  मौसम में  पत्तियाँ  हरी हो गई हैं।  पेड़ पर लाल और सुर्ख रंग के फूल खिल गए हैं। बारिश की बूंदें  झर रही हैं।
हम सब अपनी मुक्ति के लिए जमीन तलाश रहे हैं। तुमनें औरतों की मुक्ति का स्वप्न देखा। तुम्हारे जन्म की गाथा सब जानते हैं। ये भी जानते हैं कि तुमनें बहुत कम उम्र में मां, पिता को खोया। तुम्हें तो याद होगा वो साल जब तुम पैदा हुई थी। इतिहास में ये एक खूबसूरत घटना थी। 25 जनवरी 1882 में तुम्हारा जन्म हुआ। मैं तुमसे कुछ सदी ही पीछे हूं। तुम जनवरी में पैदा हुई मैं अप्रैल में। तुम्हारे पिता मेरे पिता की तरह बहुत प्यार करने वाले इंसान थे। मुझे पता है वो लंदन के मशहूर आलोचक और लेखक के तौर पर जाने गए। सर लेस्ली स्टीफेन और जूलिया स्टीफेन के घर में  तुम्हारा जन्म हुआ। तुमनें अपना ज्यादा  समय अपने लंदन स्थित 22 हाइड पार्क गेट घर में बिताया।  मैं जब लंदन गई थी तो तुम्हारे घर जाना चाहती थी। लोगों ने बताया उस घर के बाहर आज भी एक बोर्ड  लगा है जिस पर तुम्हारा  नाम लिखा है।  ये लिखा है कि जानी मानी नॉवेलिस्ट और आलोचक वर्जिनिया वुल्फ यहां रहती थीं।  तुमनें औरतों को हमेशा लिखने के लिए कहा। तुम जानती थी कि दुनिया में उनका लेखन आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसलिए तो इतिहास में बहुत सी औरतें बिना लिखे दफन हो गई। तुमनें कहा कि जबतक हम लिखते हैं वही मायने रखता है। आप वही लिखना चाहते हैं जो आपके लिए मायने रखता है। यह कोई नहीं कह सकता कि यह कब तक मायने रखता है युगों तक या केवल कुछ घंटों तक।
तुमनें जो लिखा वो युगों तक याद रखा जायेगा।  तुमनें स्त्रियों के लिए एक नई दुनिया गढ़ी। समाज को आयना दिखाया। लेखन की दुनिया में स्त्रियों का आना संघर्ष के लंबे इतिहास को बताता है।
महिलाओं की मुक्ति के प्रति पुरुषों के विरोध का इतिहास, संभवतः स्वयं उस मुक्ति की कहानी से भी अधिक दिलचस्प है। ये बात तुम्हारी कितनी सटीक है। तुमने अपने एक आलेख में शेक्सपियर की बहन का जिक्र किया। जो कम उम्र में मर गई। उसनें एक शब्द नहीं लिखा। ये बात तुम कितनी पीड़ा से कहती हो। दुनिया के महान लेखकों ने उन स्त्रियों को मौका नहीं दिया जो लिख सकती थी। हमारे यहां भी ऐसे किस्से हैं। महान कवि रविन्द्र नाथ टैगोर की जिन्दगी के बारे में भी ये बात है। उनकी जिन्दगी में बहुत सारी स्त्रियां आई। बहुत सारी स्त्रियों से प्रेम किया। रविन्द्र नाथ के बड़े  भाई यतींद्रनाथ की पत्नी  कादंबरी से उनका गहरा प्रेम था। कादंबरी लिखती थी। उनके प्यार में उनका लेखन शामिल था।  इस प्रेम का दुखद अंत हुआ।  १८८४ में कादंबरी नें आत्महत्या कर ली। दुनिया के किसी कोने में स्त्री हो उनका दुख एक सा है। तुमनें शेक्सपियर की बहन के बारे में जो लिखा उस लेख को मैं यहां उदाहरण के तौर पर रखना चाहती हूं। ताकि दुनिया को याद रहे कि उन्होंने स्त्रियों के साथ क्या किया।
तुमनें अपने  लेख में बताया था कि शेक्सपियर की एक बहन थी।  वह कम उम्र में ही मर गई – अफ़सोस, उसने कभी एक शब्द भी नहीं लिखा। वह उस जगह दफ़न है जहाँ अब बसें रुकती हैं, एलिफेंट और कैसल के सामने। अब मेरा मानना है कि यह कवि जिसनें कभी एक शब्द भी नहीं लिखा और चौराहे पर दफ़न हो गई,  वो अभी भी जीवित है। वह आपमें और मुझमें, और कई अन्य महिलाओं में जीवित है । वे तमाम महिलाएं जो आज रात यहाँ नहीं हैं, क्योंकि वे बर्तन धो रही हैं और बच्चों को सुला रही हैं। लेकिन वह जीवित है, क्योंकि महान कवि मरते नहीं। मेरा मानना है कि अगर हम एक सदी या उससे ज्यादा जीते हैं। अगर हमारे अपने कमरे हों, अगर हमें स्वतंत्रता की आदत है और जो हम सोचते हैं, उसे लिखने का साहस है। तो दुनिया बदल सकती है। अगर हम इस तथ्य का सामना करें, हमारा हाथ पकड़ने के लिए कोई हाथ नहीं है।  
तुमनें सच कहा वर्जिनिया स्त्रियों को अपना रास्ता खुद बनाना होगा। उसके पास पहले से कोई बना बनाया रास्ता नहीं। पर अगर स्त्रियां रचती हैं तो रास्ते फूट पड़ेंगे। वो तमाम स्त्रियां जो नहीं लिख सकी, जो नहीं कह पाई उनके शब्द हमारे होंगे।  उनके ऊपर हुए जुल्म के निशान हमारी पीठ पर है। हम सब जानते हैं कि इतिहास में उसके साथ क्या हुआ और भविष्य के लिए हमें कितना लड़ना है। हम अपने पूर्वजों के रक्त को भूल नहीं सकते। उन्होंने जो मिट्टी सींचा, देखो उस जमीन पर पेड़ उग आएं हैं। उसकी शाखें फैल रही हैं । हरी- हरी पत्तियां उग आई हैं। मुझे पाश की कविता याद आ रही है।
मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा…

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