किसी भी विषय से संबंधित आंकडे उसके वैज्ञानिक आधार होते हैं. उनके आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं. ये आंकड़े सरकार की किसी एक नीति से संबंधित होते हैं. सरकार की वह नीति कितनी सफल या असफल रही यह इन आकडों का निष्कर्ष ही हमें बताते हैं .नीचे देश की प्रजमन दर के 2012-2014 के आंकडों की तुलना 2022-2024 के आंकडों से कर यह बताने की कोशिश की गयी है कि देश में प्रजनन दर घटा है. सरकार ने बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगाने के लिए नीति बनाई और एक दंपत्ति के दो बच्चों को आदर्श परिवार माना और इसे आंकडे के रूप में 2.1 मानक संख्या में दिखाया है. यदि सभी राज्यों में जनसंख्य की दर इस मानक संख्या के अनकूल रहता तो माना जा सकता था कि जनसंख्या वृद्धि संतुलित हो रही है. लेकिन हमारी जनसंख्या बढ़ती रही और भारत दुनियां की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश बन गया है.
यहां 2022 से 24 के बीच के ऐसे आंकडे हैं जो यह बता रहे हैं कि 2012 से 2014 की तुलना में भारत की प्रजनन की दर घटी है. एसआरएस (सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम ) 2024 के अनुसार प्रजनन दर 2.1 से भी कम होकर 1.9 हो गया है. लेकिन इससे भी कम हो जाय तो इसका अर्थ यह होगा कि जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक स्थिति में पहुंच रही है. लेकिन जब राज्यवार प्रजनन दर निकाली गयी तो एसआरएस ने पांच राज्यों के आंकडों को कुछ अलग पाया है. क्योंकि एक दशक में इन राज्यों का प्रजनन दर अन्य राज्यों की तुलना में बहुत कम घटा है.
हर राज्य में ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों के प्रजनन दर को अलग अलग निकाला गया है लेकिन कुल मिलाकर राज्य की प्रजनन दर (टोटल फेरटेलिटी रेट या टीआरएफ ) का औसत निकाला गया है. बिहार 2.9 के साथ सबसे ऊपर है तो उसके बाद उत्तर प्रदेश का टीआ एफ 2.6, मध्य प्रदेश 2.4, राजस्थान 2.3, छत्तीसगढ़ 2.2 तथा झारखंड 2.2 है .
सबसे कम टीआरएफ दिल्ली का रहा 1.2. उसके बाद तामिलनाडू का 1.3 और पश्चिम बंगाल का 1.3 है.
सभी राज्यों के आंकडे यह बता रहे हैं कि शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रजनन दर ज्यादा है,
जिन राज्यों का टीआरएफ मानक संख्या ( 2.1 ) से कम है उन राज्यों में 0-4 वर्ष तक के बच्चों की संख्या भी कम है. जैसे तामिलनाडू में यह 18 फीसदी मात्र है, जबकि बिहार में इस आयुवर्ग के बच्चे 31.5फीसदी हैं.
भारत की काम करने लायक आयुवर्ग 15-59 वर्ष के लोगों की संख्या बढ़ रही है. इसका अर्थ यह भी हुआ कि बच्चे पैदा करने लायक उम्र के लोग हमारे देश में अभी भी अधिक है. निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि प्रजनन दर 2012-14 से 2022-24 की तुलना की जा रही है तो यह घटी हुई लग रही है लेकिन जनगणना के बाद ही पता चलेगा कि वास्तविक स्थिति क्या है.
2011 के बाद भारत में जनगणना नहीं हुई. 2021 में होना था लेकिन कोरोना का बहाना था. बाद में हुक्मरानों को चुनावों से फुरसत नहीं मिली. अब इस वर्ष कोई चुनाव नहीं होने वाला है. शायद अगले वर्ष के चुनावों से पहले जनगणना पूरी हो जाय. सरकार को तो जनगणना के बाद परिसीमन कर सीटों को बढ़ाना है.
प्रजनन दर के घटने की खबर से हम खुश नहीं हो सकते. इससे जुड़े कई प्रश्नों को सरकार से पूछा जायगा. पहला प्रश्न तो यह है कि सरकार की जनसंख्या संबंधी नीति क्या है. क्योंकि पूरे देश में प्रजनन दर समान नहीं है. आंकड़े बता रहे हैं कि जिन राज्यों की जनसंख्या संतुलित है वहां आर्थिक विकास हुआ है. वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, तथा जीवन की अन्य सुविधाएं उपलब्ध है. दूसरी ओर वे छह राज्य जो जनसंख्या को नियंत्रित नहीं कर पाये हैं, वे हिन्दी पट्टी के वे राज्य हैं जो आर्थिक रूप से पिछडे हैं. वहां शिक्षा, स्वास्थ्य या सडक जैसी सुविधाएं सबों को उपलब्ध नहीं है. और इन राज्यों में बीजेपी की सरकार है. जहां पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत् के सलाह के अनुसार हिन्दू परिवार बच्चों की संख्या बढ़ाने में लगे हैं.
जो सरकार, अभी जितने बच्चे है, उनके लिए ही उचित शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषक भोजन की व्यवस्था नहीं कर पा रही है वह आने वाले बच्चों की फौज के लिए कितनी तैयार है? यह सब इसलिए हो रहा है क्यों कि 78. 8 प्रतिशत हिन्दू लोगों को मात्र 14.2 प्रतिशत प्रबल प्रतिद्वन्दी अल्पसंख्यक का सामना करना है. इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान लोगों को भ्रमित ही करते है और उनका नुकसान करते हैं. पानी, सड़क शिक्षा, स्वास्थ्य तथा नौकरियों जैसी मुख्य समस्याओं से ध्यान भटका कर सरकार तो फायदे में रहती है.
इस तरह के बयानों से बीजेपी का महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण भी प्रकट होता है. यह कहना कि हिन्दू महिलाएं ज्यादा बच्चे पैदा करे, इसका अर्थ यह हुआ कि महिलाएँ बच्चा पैदा करने की मशीन है. आप जब आदेश दें, वे पैदा कर देंगी. बच्चा पैदा करना महिला के लिए पुर्नजन्म की तरह है. कई राज्यों में महिलाओं को प्रसव के लिए उचित स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. प्रसव के बाद महिलाओं को पौष्टिक आहार तथा आराम की जरूरत होती है, वह भी उन्हे उपलब्ध नहीं होता है. कई बार ऐसा भी होता है कि प्रजनन के लिए आयी महिला को आस्पताल में जगह की कमी बताकर टाल दिया जाता है और वह महिला सड़क पर ही बच्चे को जन्म दे हेती है. कभी-कभी दूसरे आस्पताल जाने के रास्ते में ही महिला की मृत्यु हो जाती है. यह है हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था.
बच्चों की संख्या ही बढ़ानी थी तो उस पंद्रह वर्ष की मां से उसका निर्णय क्यों नहीं पूछा गया. क्योंकि वह नाबालिग थी. उसकी भलाई केवल उसके माता-पिता ही सोच सकते थे. उसके नवजात शिशु को लावारिसों की कतार में खड़ा कर दिया गया. इस तरह के अनेको बच्चे सरकार के प्रजनन दर में गिने जाते हैं या नहीं? या वे बच्चे जो पेट भरने के लिए कचरे के ढेर में रद्दी इकठ्ठा करते रहते हैं, उनका प्रजनन दर भी सरकारी आंकडों में है या नहीं?

जनसंख्या नियंत्रण में नाकाम रहे हिंदी प्रदेश
किसी भी विषय से संबंधित आंकडे उसके वैज्ञानिक आधार होते हैं. उनके आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं. ये आंकड़े सरकार की किसी एक नीति से संबंधित होते हैं. सरकार की वह नीति कितनी सफल या असफल रही यह इन आकडों का निष्कर्ष ही हमें बताते हैं .नीचे देश की प्रजमन दर के 2012-2014 के…
4–6 minutes





प्रातिक्रिया दे