बिहार आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई एवं जेपी को दूसरा गांधी कहा गया। जेपी ने 5 जून 74 को पटना के गांधी मैदान से विशाल सभा को संबोधित करते हुए संपूर्ण क्रांति का नारा दिया, जो पूरे आंदोलन का मूल मंत्र बन गया। लेकिन इस शब्द का भ्रामक अर्थ भी निकाला गया। अस्पष्टता के आरोप लगे, लोहिया के सप्त-क्रांति से जोड़ा गया, तो उसे दिवा स्वप्न भी कहा गया। 5 जून के अवसर पर जेपी के विचारों को (संपूर्ण क्रांति के संदर्भ में )उनके ही शब्दों में प्रस्तुत हैः
‘‘यह आंदोलन छात्र संघर्ष समिति की मात्रा 10- 12 मंगों की पूर्ति के लिए नहीं, यह संपूर्ण क्रांति की शुरुआत है। इसका उद्देश्य बहुत दूरगामी है, भारतीय लोकतंत्र को वास्तविक तथा सुदृढ़ बनाना, जनता का सच्चा राज कायम करना, समाज से अन्याय, शोषण आदि का अंत करना, एक नैतिक, संस्कृतिक तथा शैक्षणिक क्रांति लाना, नया बिहार बनाना और अंततोगत्वा एक नया भारत बनाना है।
यह कोई गद्दी की लड़ाई नहीं, सत्ता हथियाने की लड़ाई नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन, प्रक्रिया- परिवर्तन और नव निर्माण की बात है। यह संपूर्ण क्रांति समस्त जनता की क्रांति है। इसका मोर्चा केवल राजधानियों में नहीं बल्कि हर गांव और शहर में है, हर कार्यालय, विद्यालय और कारखाने में है। यहां तक की हर परिवार में है। इन सब मोर्चो पर संपूर्ण क्रांति की लड़ाई हमें लड़नी है।
हम नया समाज बनाना चाहते हैं, इसलिए हम सरकार और समाज, शिक्षा और चुनाव, बाजार और विकास की योजना, हर चीज में परिवर्तन चाहते हैं। बेकारी, महंगाई आदि समस्याओं का समाधान भी तब तक नहीं हो सकेगा, जब तक कि आर्थिक विकास और योजनाओं की दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन ना हो। जब तक तिलक -दहेज है छुआछूत, उंच नीच के भेदभाव दूर नहीं होते और जब तक हम अच्छी तरह नहीं समझ लेते कि खुदगर्जी के स्थान पर पारस्परिक मदद और सहयोग से ही हम ऊंचे उठ सकते हैं, तब तक ना सामाजिक न्याय हासिल होगा, ना भ्रष्टाचार मिट सकेगा। शिक्षा में क्रांति का उद्देश्य भी तभी पूरा हो सकेगा। यह सब सवाल आज की व्यवस्था के साथ और एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। इन सब में परिवर्तन लाए बिना संपूर्ण क्रांति होने वाली नहीं। संपूर्ण क्रांति की कल्पना में तो यह है कि सारे समाज में परिवर्तन हो, समाज के हर अंग में हो, व्यक्ति के जीवन में हो, सामाजिक संस्थाओं के रूप रंग, चाल चलन में हो, उसके संगठन और कार्य पद्धति में हो, इन सब में परिवर्तन हो।
संपूर्ण क्रांति में शामिल होने वाले हर व्यक्ति को यह सब करना होगा। सबसे पहले तो आपस में जाति के व्यवहार को पूर्णतया छोड़ना होगा। खान-पान के मामलों में भी एकता का आग्रह करना होगा ा विज्ञान टेक्नोलॉजी और औद्योगिकरण के विकास के साथ-साथ इस प्रकार की छुआछूत की भावना कम होती जाएगी। इसके लिए एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम या महत्वपूर्ण साधन अंतर्जातीय विवाह हो सकता है।
शासन के द्वारा समाज में क्रांति और वह भी संपूर्ण क्रांति दुनिया में आज तक नहीं हुई। इतिहास में अब तक जो क्रांतियां हुई है वह मेरे ख्याल से मुख्यतः राजनीतिक क्रांतियां थी। और जिसे औद्योगिक क्रांति कहा जाता है, उसको छोड़ कर बाकी जो भी राजनीतिक क्रांतियां हुई हैं वे अधिकतर हिंसा के माध्यम से हुई हंै। अब हम चाहते हैं कि गांधी मार्ग से, अहिंसा के माध्यम से भारत में एक संपूर्ण क्रांति हो।
सात प्रकार की क्रांतियां मिलकर संपूर्ण क्रांति होती है, ऐसा मैं कहता रहा हूं। वे हैं-सामाजिक क्रांति, आर्थिक क्रांति, राजनीतिक क्रांति, सांस्कृतिक क्रांति, वैचारिक अथवा बौद्धिक क्रांति, शैक्षणिक क्रांति एवं आध्यात्मिक क्रांति। इस शब्द से परिवर्तन और नव निर्माण दोनों ही अभिप्रेत है।
जयप्रकाश नारायण की पुस्तक, मेरी विचार यात्रा – भाग २ से सभार.

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