”जलगांव हो या गुवाहाटी, अपना देश अपनी माटी“ के नारे के साथ 13 से 15 जून 2026 को लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान और गाँधी रिसर्च फाउंडेशन के तत्वावधान में, गांधी तीर्थ, जलगांव, (महाराष्ट्र ) में महिला सह चिंतन शिविर का आयोजन हुआ। इन तीन दिनों के सह चिंतन शिविर में महाराष्ट्र, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में महिलाएँ शामिल हुई थीं। लोकतान्त्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान के बैनर तले यह तीसरा महिला शिविर था। पहला शिविर शांति निकेतन, पश्चिम बंगाल में हुआ था, तो दूसरा उत्तराखंड के कांडीखाल में। महिलाओं के अलग शिविर करने का उदेश्य समाज में महिलाओं की समस्याओं, उनके साथ होने वाले दोहरे व्यवहार, दुर्व्यवहार, अलग मान्यताओं को गहनता और गंभीरता से समझने की कोशिश करना और उससे आगे निकालने पर चर्चा करना था। आज देश के हर क्षेत्र में महिलाएं आगे आ रहीं हैं, देश की राजनीति में उनका एक अपना महत्व है, फिर भी समाज में उनकी स्थिति दोयम बनी हुई है। हमारी मान्यता है कि महिलाओं की हिस्सेदारी के बगैर हमारा राष्ट्र निर्माण अधूरा है।
शिविर का उद्घाटन 13 जून 2026 को सोनचंपा के पौधे को एक गमले में, भारत भर से आई हुई महिलाओं / कार्यकर्ताओं के हाथों से एक -एक मुठ्ठी मिट्टी डाल कर रोपा गया।
पहले दिन के दूसरे सत्र में निशा शिवुरकर ने ”गाँधी जी के स्त्री पुरुष समता का विचार“ के बारे में बताया कि आज के नफरत भरे वातावरण में प्यार की जरूरत है। कस्तूरबा जी की डायरी का भाषांतर तुषार जी ने किया है। उसमें उन्होंने लिखा है की- ”अहिंसा यदि अस्तित्व का नियम है, तो भविष्य महिलाओं का है“। गांधीजी ने महिलाओं से आह्वान किया कि पर्दा प्रथा महिलाओं पर जुल्म है और महिलाओं को इसे त्यागना चाहिए।
रजिया पटेल ने अपने विषय ”महिला राजनीति और महिला संस्कृति“ पर विस्तार से बात रखते हुए कहा कि संस्कृति का मतलब है कि हमारे पास जो अच्छी चीज है, उसे ओर अच्छी बना कर अगली पीढ़ी को सौंपना। उन्होंने कहा कि मानवी संस्कृति की नींव महिलाओं ने रखीं है। वो कहती हैं-  औरतांे ने कृषि संस्कृति की स्थापना की है। कृषि संस्कृति पर पशुपालन संस्कृति का हमला हुआ और कृषि संस्कृति की हार हुई, तभी से महिला की गुलामी का दौर शुरू हुआ। स्त्रियों के विरोध का प्रमाण हर काल में मिलता है। बौद्ध काल की थेरी गाथा में भी इसके प्रमाण मिलते है। भक्ति पंथ और सूफी पंथ में जो महिलाएँ थीं, उन्होंने मुक्ति की गाथा लिखी। प्रशासनिक परंपरा का भी उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कल्याणकारी राज्य के दो उदाहरण है- एक रजिया सुलतान और दुसरा नाम है अहिल्याबाई होलकर का। दोनों ने आम जनता के हित में काम किया। सुधार आंदोलन में सावित्रीबाई फुले का बड़ा योगदान है।
3) चयनिका शाह ने ‘एलजीबीटीआईक्यू के प्रश्न और कानून’ विषय से हमें अवगत कराया, क्योंकि शिविर में शामिल हम सभी में ज्यादातर लोग में इसकी जानकारी नहीं थी. चयनिका ने बताया कि हम केवल स्त्री- पुरुष की समस्याओं की बात करते हैं, लेकिन हमारे समाज में कई तरह की यौनिकता के लोग भी है, जिनकी अपनी कई समस्याएँ हैं। उन्हें हम इंसान मानते ही नहीं। जबकि सभी का सम्मान होना चाहिए। यह हमारी जेंडर की पहचान से जुड़ा है। चूंकि ये पारंपरिक सामाजिक और लैंगिक मानदंडों से मेल नहीं खाते इसलिए इनका मज़ाक बनाया जाता है।
अभी सरकार ने इस संदर्भ में जो कानून पारित किए है, वह हम सभी को स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि पहले हम अपने शरीर के आधार पर यह तय करते थे कि मैं क्या हूँ, स्त्री, पुरुष या ट्रांस जेंडर, जबकि अभी कानून बन जाने के बाद डॉक्टरों की एक टीम हमारे शरीर की जांच करेगी और उसके आधार पर सर्टिफ़िकेट देगी कि हम यौनिकता की किस श्रेणी में आते हैं।
आज नारीवादियों को इस विषय पर सोचना चाहिए और साथ आना चाहिए।  
4) मनिषा बॅनर्जी ने वोटरों के विशेष गहन पुनरीक्षण पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि बिहार और बंगाल में सबसे ज्यादा महिलाओं के वोट कटे हैं। पहले भी वोटर लिस्ट का काम होता था लेकिन अभी जो एफआईआर हो रहा है, उसमें हमें ही सिद्ध करना होगा कि हम इस देश के नागरिक है। महिलाओं का प्रवास सबसे ज्यादा होता है। महिला का घर, गांव, कभी-कभी राज्य भी छूट जाता है। लोगों के पास सब कागज होने के बावजूद तार्किक विसंगति के कारण भी कई नाम काट दिए गए। सवाल यह है कि घुमंतू, वेश्या और एलजीबीटीक्यू कहां से पेपर लाएंगे.
5. गडचिरोली से आई शुभदा देशमुख ने महिलाओं के  स्वास्थ्य/ आरोग्य के बारे में जानकारी दी कि महिलाओं के स्वास्थ्य पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। आज की स्थिति में महिलाओं के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत है। गरीबी और निरक्षरता, पोषण के बारे में जानकारी नहीं रखना भी उनके स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार हैं।
6. संविधान जागरण कार्यक्रम के निखील ने बजट के बारे में अपनी राय रखते हुए कहा कि संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांत और मोदी सरकार की नीतियां दोषपूर्ण है। महिलाओं के लिए बजट का प्रावधान सही नहीं है।
7) माधुरी ख़पसे ने एकल महिला प्रश्न और महिला किसानों की समस्याओं पर अपने विचार रखे. इन्होंने बताया कि एकल महिला और किसान महिला की कोई पहचान हमारे समाज में नहीं है, जिसके कारण एक अकेली महिला को समाज के कई दंश झेलने पड़ते हैं, कई बार उसे आत्महत्या के लिए भी मजबूर होना पड़ता है, दुख की बात यह है कि उसकी आत्महत्या की जिम्मेवारी भी उसी पर डाल दी जाती है। हमारी मांग है कि खेती से जुड़े हुए काम करने वाली महिला को भी किसान कहा जाये और अब तो ये महिलाये शासकीय योजना के कागज पत्र भी खुद जमा करती है। महिलाओं को किसान की पहचान नहीं मिलने के कारण उन्हें कर्ज नहीं मिलता।
वासंती दीघे ने आरक्षण और परिसीमन पर अपनी बात को विस्तार से रखते हुए कहा कि आज की सरकार महिलाओं को आरक्षण देना ही नहीं चाहती क्योंकि नारी वंदन कानून तो 2023 में ही पास हो चुका, जिसे सरकार लागू नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को राजनीति में आना ही चाहिए। महिला आरक्षण बिल संसद में कब -कब आया और इसका इतिहास क्या है, इसकी विस्तृत जानकारी उन्होंने दी.
परिसिमन का काम हर जनगणना के बाद होता है और जनगणना हर दस साल में होनी थी, जो 2011 के बाद वर्तमान सरकार ने नहीं कराया। परिसीमन में कई गड़बड़ियाँ की गई हैं, जैसे- काश्मीर की सीट कम बढ़ाई गई है, तो जम्मू में ज्यादा बढ़ाई गई है।   महिलाओं की मांग है कि महिला आरक्षण विधेयक तुरंत लागू हो.  
8) मान देशी फाउन्डेशन से आई शाहीन और रूपाली शिंदे ने महिला उन्नति के मॉडल को वास्तविक रूप में और बड़े ही सुन्दर तरीके से पेश किया।
15.06.2026 को सत्र के आरंभ में आनंद कुमार, लोकतान्त्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान के राष्ट्रीय संयोजक के संदेश से हुआ, उनका परिचय देते हुए किरण जी ने बताया कि आनंद कुमार जी जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में सक्रिय रहे थे, जेएनयू में पढ़ते हुए इन्होंने देश में सक्रिय राजनीतिक भूमिका निभाई।
अपने संदेश में आनंद जी ने कहा कि इस शिविर में देश भर कि महिलाएं बड़ी संख्या में शामिल हुई हैं जो कि इनकी जागरूकता का एक स्पष्ट संकेत है। उन्होंने महिला सह चिंतन शिविर को शुभ कामना दी।
सह चिंतन शिविर में पावर वॉक और पीस वॉक भी हुए। शिविर के दौरान कई गतिविधियों को आयोजित किया गया था, जैसे, कलेक्टिव ड्रमिंग, साँप सीढ़ी आदि। ये गतिविधियाँ सामूहिकता और वैचारिक सिद्धांतों को सरल तरीके से समझने में सहायक थीं। गांधी तीर्थ में एक म्युजियम है, जिसका भ्रमण शिविर में शामिल महिलाओं ने किया. .
शिविर के दूसरे दिन 14 जून 26 को सत्र समाप्ति के बाद रात में शिविर में शामिल वैशाली निकम, ज्योती, सुष्मिता काजल, अजय और सुशील ने एक नाटक प्रस्तुत किया।
गाँधी तीर्थ में शिविर का आयोजन इस लिए भी महत्वपूर्ण हो गया था कि ”गांधीजी ने  महिलाओं को चूल्हे चौके से बाहर आने’’ की बात कई बार दुहराई थी। स्त्री-पुरुष समानता की बात उन्होंने की थी।

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