‘आइ वांट ए बॉय’ पुस्तक की लेखिका अरुण कालरा ने अपनी पुस्तक में भारतीय समाज में बेटा पाने की लालसा पागलपन की किस सीमा पर पहुंच गया है, दर्शाया है. इस पागलपन के विविध दृश्य पाठकों के सामने प्रस्तुत किये जाते हैं. पहला अध्याम ‘द बर्थ आफ ए गाडेस’ पाठकों को एक पीडादायक अहसास देता है. सरिता स्ट्रेचर पर है, उसका पेरिनियम खुला पडा है. डाक्टर उसके टांके लगाने में लगे हैं. नर्स शिशु को साफ करने में लगी है. शेष लोग लेबर रूम की सफाई कर रहे हैं. मगर सरिता अपनी पीडा की परवाह किये बिना नवजात का लिंग जानना चाहती है. डाक्टर उसे डांट रही है कि पहले टांके लगवा ले. मगर उसने रोना शुरू कर दिया कि यह उसकी तीसरी संतान है. वह जानता चाहती है कि कहीं इस बार भी बेटी ने ही जन्म तो नहीं ले लिया है. जवाब में हो रही देरी से वह समझ जाती है.
इधर आया उसे डांट रही है कि उसके घरवाले बच्चे के कपडे ले कर नहीं आये है .रक्त और पेशाब की गंदगी में पड़ी सरिता निस्सहाय है. एक बुजुर्ग आया बच्चे को  ओटी शीट से ढक देती है. वह अच्छी तरह जानती है कि घरों में लक्ष्मी आने पर घर वाले अचानक गायब हो जाते हैं.
डा अरुणा लिखती है कि वह पहली बार किसी कन्या शिशु की डिलीवरी नहीं करा रहीं थी. उनको अच्छी तरह पता था कि लडकी पैदा होने पर ऐसी ही प्रतिक्रिया होती है और महिलाओं को भोगने वाली पीडा से वे भी आहत होती है. इसलिए वह हर डेलीवरी के पहले प्रार्थना करती है कि लड़का पैदा हो. पर ईश्वर की योजना अलग होती है. उनके मन में यह भी  प्रश्न उठता है, यदि ईश्वर न्यायप्रिय है तो क्यों नहीं वह 50 फीसदी लडके और 50 फीसदी लडकियों को पृथ्वी पर भेजता है.
अनैच्छिक कन्या शिशुओं के जन्म के समय का ऐसा दृश्य किसी वर्ग विशेष और केवल सरकारी आस्पताल आने वालों मे ही नहीं दिखता है, बल्कि बडे-बडे पाइव स्टार आस्पतालों में भी पुत्र रत्न की प्राति के लिए अनेक उपाय करते देखा जा सकता है. कुछ शहरों में ऐसे डाक्टरों को चिन्हित कर रख जाता है जिनके हाथों डेलीवरी से पुत्ररत्न की ही प्राप्ति होती है. पुस्तक में ऐसे ही एक डाक्टर सक्सेना का जिक्र है जो स्त्रियों को बेटा पैदा करने के लिए विशेष चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करते थे.
एक अध्याय में एक ऐसे विशेष परिवार का जिक्र है, जिस परिवार की दादी को पूरा विश्वास था कि उनकी बहु इस बार बेटा ही जनेगी क्योंकि उन्होंने बहु का इलाज थाइलैंड के ऐसे आस्पताल में कराया था जहां बेटा पैदा करवाने की गारंटी दी जाती थी. दादी को इस बात का भी दुख था कि उनकी बहु बहुत जिद्धी है. वह तो दो बेटियों से ही संतुष्ट है. तीसरा बेटा पैदा करना ही नहीं चाहती. लेकिन उनका बेटा इस चिंता में ही घुल जा रहा है कि उसके बाद घर की संपत्ति को कौन संभालेगा. इसलिए बहु को तीसरा बच्चा पैदा करने के लिए बाध्य किया गया. होने वाले बच्चे की दादी तो इतनी आश्वस्त थी कि बहु को बेटा ही होगा और बच्चे के पैदा होने के बाद डाक्टरों और नर्सों तथा अस्पताल के पूरे स्टाफ को बांटने के लिए तोहफे रवरीदने लगी. पर इतने उपायों के बाद भी बेटी ही पैदा हुई. यह सुनते ही दादी मूर्छित होकर गिर पड़ी.
यह पुस्तक वितस्ता पब्लिकेशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है. पुत्र प्राप्रि की इच्छा में समाज पागलपन की किस सीमा तक जा सकता है, इसक वर्णन लेखिका ने बखूबी किया है. यह पुस्तक समाज की कुरीतियों के लिए एक आइने के समान है. इसलिए अवश्य पठनीय है.

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