जाड़े का मौसम था। भाषा संरक्षण से जुड़े एक कार्यक्रम के लिए मुझे, जमशेदपुर जाना था। कड़ाके की ठंड, चारों ओर घना कुहासा. हवा ऐसी कि मानो रूह तक को कंपा दे। बस में मेरी सीट एक कम उम्र कि लड़की के पास थी। उसे उल्टी कि समस्या थी, इसलिए उसने खिड़की खोल रखी थी। बाहर से आती सर्द हवा, सीटी बजाती हुई भीतर घुस रही थी। मैं उस ठंड को सह नहीं पाई और उठ कर दूसरी सीट पर जा बैठी। लगभग ढाई घंटे में मैं जमशेदपुर पहुंची। कार्यक्रम में भाग लिया और उसी रात रांची के लिए रवाना हो गई। बस चल पड़ी. बाहर सन्नाटा था, भीतर ठंड। बस में बैठे हुए लोग अपने-अपने तरीके से समय काट रहे थे, कोई बातें कर रहा था, कोई फोन पर लगा था, तो कोई वीडियो देख रहा था। मैं भी अपने सीट पर बैठी कुछ लोगों से बात करती रही। जब हम बुन्डू पहुंचे तो लगभग तीस वर्ष की एक महिला ने मुझसे अपनी सीट पर बैठने के लिए कहा और मेरा बैग हटाने का निवेदन किया। मैंने बिना कुछ कहे बैग हटा लिया। मैं फोन में व्यस्त थी, इसलिए उनका चेहरा ठीक से देख नहीं पाई। कुछ देर बाद मैंने उनकी ओर देखा, वे सो रहीं थीं।
थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझसे पूछा,
”हम कहाँ पहुंचे?“  
मैंने कहा,
”अंधेरा है, ठीक से समझ नहीं आ रहा है, लेकिन गूगल मैप बता रहा है कि कांटा टोली बस स्टैंड पहुँचने में अभी लगभग एक घंटा लगेगा।”
वे चिंतित होकर बोली, ”घर पर मेरा छोटा बेटा है, जल्दी पहुंचाना है।”
मैंने पूछा ”कितनी उम्र है?“
उन्होंने कहा,
”बेटा नौ साल का है, और बेटी चौदह साल की।”
मैंने भी सहज भाव से कहा,
”मेरा भी डेढ़ साल और तीन साल के दो बच्चे हैं, जिन्हें छोड़ कर आई हूँ।”
उन्होंने पूछा, ”घर पर उन्हें सँभालने के लिए कोई है?“
मैंने कहा,
”हाँ है…..लेकिन अगर देर हो गई तो वे चिंता करेंगे।”
मैंने पूछा, ”आप घर पर अकेली हैं क्या?“
उन्होंने धीरे से कहा,
”हाँ मैं अपने दोनों बच्चों को अकेले ही पाल रही हूँ।”
मैंने उन्हें ध्यान से देखा, लेकिन उनके पहनावे से कुछ समझ नहीं पाई. इस इलाके की महिलाएं अक्सर सिंदूर या मंगलसूत्र नहीं पहनती, इस लिए मैंने पूछ ही लिया-
”आपके पति हैं न?“
वे कुछ क्षण चुप रहीं। फिर बोलीं,
”हाँ…. हैं।”
मेरी उलझन और बढ़ गई।
थोड़ी देर बाद उन्होंने खुद ही कहना शुरू किया-
”बच्चों को स्कूल जाना है, मुझे भी पढ़ाई करनी है।”
मुझे लगा वे तकनीकी या उच्च शिक्षा ले रहीं होंगी। मैंने पूछा, ”क्या पढ़ रही हैं?“
उन्होंने कहा,
”बी. ए. कर रही हूँ।”
मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने कहा,
”शादी और परिवार की वजह से पढ़ाई छूट गई होगी, अब फिर से शुरू कीं हैं?“
उन्होंने उत्तर दिया,
”नहीं, जब बच्चे थोड़े बड़े हुए, तो मैंने खुद छठी में दाखिला लिया। आठवीं, दसवीं, बारहवीं- सब फर्स्ट  डिवीजन से पास किया। बच्चे मेरे साथ ही स्कूल जाते थे। गाँव में रहती थी इसलिए उन्हें अपने साथ बैठा कर रखती थी, ताकि कोई कुछ कहे नहीं।”
फिर मैंने पूछा,
”पति क्या करते हैं?“
वे बोलीं,
”ड्राइवर हैं। और वही मेरे जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य रहें।”
फिर उनकी आवाज भारी हो गई।
उन्होंने बताया-
”मेरी शादी बारह साल के उम्र में मुझसे बीस साल बड़े आदमी से कर दी गई। बचपन ही छिन गया। दो बच्चे, घर- परिवार, मारपीट, दूसरी औरत….. रिश्ता पूरी तरह टूट गया।”
वे तलाक लेना चाहती थीं, लेकिन पति धमकी देता था.
”तलाक दूँगा तो खर्च उठाना पड़ेगा, इसलिए मार दूँगा, जेल चला जाउंगा, पर तलाक नहीं दूँगा।”
उन्होंने कहा-
”बचपन माँ-बाप खा गए, जवानी पति ने बर्बाद कर दी। तब मैंने तय किया, अब अपने लिए जीना है।”  
वे बच्चों को लेकर गाँव से निकल आईं, शहर में किराये के घर में रहने लगीं। बच्चों को अच्छे स्कूल के हॉस्टल में रखा। पति से कोई रिश्ता नहीं रखा. न सिंदूर न मंगलसूत्र, न पहचान।
उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा,
”अब बस। अब मैं अपने अस्तित्व के लिए जी रहीं हूँ। बच्चों और अपने लिए।”
अंत में उन्होंने कहा,
”उनके अब पचास साल हो चुके हैं। कोई नहीं मिल रहा, इसलिए चाहते हैं कि मैं लौट जाऊँ। पर जब वे बच्चों की फीस और किराया नहीं भर पाएंगे, तब खुद ही छोड़ देंगे। तब मैं और मेरे बच्चे सुकून से जी पाएंगे।”
बस आगे बढ़ती रही। बाहर ठंड थी, भीतर एक स्त्री की तपती हुई संघर्ष -कथा।
समाज के बनाए नियम- कम उम्र में शादी, स्त्री पर अत्याचार, और फिर उसी समाज से ‘नारी सशक्तिकरण का उपदेश.
उस रात उस बस में, ये सारे शब्द मेरे लिए जीवित सच बन गए।

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