वामपंथ को पसंद करने की एक हजार वजहों में से एक ये भी है कि इसमें स्त्रियाँ सिर्फ बॉयोलॉजिकल या सोशल एंटिटी नहीं है, वे इंटेलेक्चुअल एंटिटी हैं।
ठीक-ठीक तफ़सील याद नहीं है, कुछ वक्त पहले एक रील देखी थी, जिसमें बीजेपी की महिलाएँ शायद सपा के किसी सांसद का घेराव कर रही थीं और नारेबाजी कर रही थीं।
सांसद महोदय ने बहुत प्यार और शांति से सवाल किया, “आप क्यों घेराव कर रही हैं?”
जवाब मिला, “आप हमारे अधिकार से खिलवाड़ कर रहे हैं। आप महिला आरक्षण बिल का विरोध कर रहे हैं।” सांसद महोदय ने बहुत धैर्य दिखाते हुए उनसे कुछ सवाल पूछे, जैसे महिला आरक्षण बिल कब पास हुआ, अब तक लागू क्यों नहीं हुआ आदि-आदि।
एकाध महिला ने ठीक-ठाक जवाब दिए, तो उन्होंने पूछा कि फिर सरकार से पूछिए कि वो लागू क्यों नहीं कर रही है। महिलाएँ फिर से नारेबाजी करने लगीं।
देहरादून में कांग्रेस की रैली के वक्त बीजेपी की महिलाएँ धक्का-मुक्की करने पहुँच गईं। फिर ठीक राहुल गाँधी के संवाद के समय बीजेपी ने किसी सिंगर को बुला कर उसका शो करवा दिया। व्हाट्सएप के शुरुआती दौर में बीजेपी, संघ ने ही महिलाओं के नेटवर्क को पहचाना था।
जुलाई महीने से पहले तक की मेरी जानकारी में महिलाओं का कोई भी व्हाट्सएप ग्रुप हो, सारे मैसेजेस दक्षिणपंथियों द्वारा फॉरवर्डेड ही हुआ करते थे। अभी क्या हाल है पता नहीं। मगर बीजेपी और संघ के आईटी सेल ने महिलाओँ और रिटायर्ड अंकल-आंटियों की ऊब और इल्लिट्रेसी की ताकत को सबसे पहले समझा था।
अपनी समझ के आने के बाद से अब तक अपने आसपास की स्त्रियों को जब भी देखती हूँ तो लगता है कि वे जो है, उसे बचाने और बढ़ाने में अपनी पूरी ऊर्जा खत्म करती नजर आती हैं। क्यों? इसके कई सारे जवाब हो सकते हैं वो फिर कभी, इस वक्त सिर्फ ये कि स्त्रियों या यूँ कहूँ कि आम लोगों की इसी प्रवृत्ति का लाभ दुनिया भर में दक्षिणपंथी उठाते रहे हैं।
दक्षिणपंथ स्त्रियों को देवी और दानवी के द्वैध में रखता है और उसे शील्ड की तरह इस्तेमाल करता है। धर्म में, राजनीति, समाज और संस्कृति में भी। यहाँ स्त्रियों के लिए इंसान होने की कोई गुंजाइश नहीं है। यहाँ स्त्री हर उम्र में एक रिश्ते, एक फ्रेम में कैद रहती हैं।
वामपंथी विचारधारा से जुड़ी स्त्रियाँ एक इंटेलेक्चुअल एंटिटी के तौर पर विकास करती हैं। वे फिजिकल बीईँग से ज्यादा इंटेलेक्चुअल बीईंग होती हैं। कई बार मैं इस सवाल पर उलझी हूँ कि आखिर दुनिया भर में वामपंथ को लेकर इतना डर क्यों है? वामपंथ और स्त्रीवाद के लिए इतनी नफरत क्यों हैं?
शायद इसलिए कि जिसे दुनिया की समझ आ गई हो उस व्यक्ति को इस्तेमाल करना आसान नहीं होता। दक्षिणपंथी स्त्रियाँ आसानी से इसलिए इस्तेमाल हो जाती हैं, क्योंकि कुछ न जानने-समझने में उनकी सुविधा है। और व्यवस्थाएँ अन्यायी, अत्याचारी और आततायी होते हुए भी सस्टेन इसलिए भी करती हैं कि बदलाव असुविधाजनक होता है।
जंतर-मंतर आंदोलन में वामपंथी संगठनों से जुड़ी लड़कियाँ खासकर दो चेहरे नेहा और अंजलि को सुन कर ये लिखने का मन हो आया कि वाम संगठनों में लड़कियों की क्या शानदार ट्रेनिंग हुआ करती है!
इस आंदोलन में नेहा, मनीष और आमीन (मुझे इस बात ने खासतौर पर दुख दिया कि नेहा के अलावा बाकी दोनों साथी हाइलाइट नहीं हुए। आखिर अनशन तो उन दोनों ने भी किया था न) को क्या जरूरत थी इस अनशन की?
ये किन लोगों के लिए लड़ रहे हैं? किन लोगों के लिए लाठियाँ खा रहे हैं। नेहा और अंजलि को जब मैं बोलते सुनती हूँ तो चकित होती हूँ, इस उम्र में क्या भाषा है, कितनी क्लियरिटी है, कितनी समझ है और किस तरह से अपनी बात को रखती हैं।
इधर का चुनाव स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, कंगना रानावत औऱ मैथिली ठाकुर जैसी महिलाएँ हैं, जिन्हें जहाँ चाहे, जैसे चाहे इस्तेमाल किया जा सकता है। क्योंकि वे इस्तेमाल होने के लिए प्रस्तुत हैं, वे सिवा ‘स्त्री देह’ होने के कुछ औऱ हो ही नहीं पाई हैं, बल्कि यूँ भी कहा जा सकता है कि इनका चुनाव किया ही इसलिए गया है कि वे स्त्री शऱीर में खाली दिमाग रखती हैं।
पहले भी कभी ये लिखा था- राजनीति में स्त्री का इस्तेमाल कई तरह से किया जाता है। दक्षिणपंथी विचारधारा स्त्रियों का इस्तेमाल सत्ता तक पहुँचने के टूल की तरह करती है। हेमा मालिनी या कंगना या मैथिली जैसी स्त्रियाँ संसद में एक सीट है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं। चूँकि विचारशील नहीं हैं, इसलिए इन्हें कहीं भी कैसे भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
इन सारी स्त्रियों को सत्ता के साथ शेरनी होने का भ्रम दिया जाता है, जबकि नेहा और अंजलि जैसी लड़कियाँ सत्ता के सामने असली शेरनियाँ हैं। दक्षिणपंथी महिलाएँ सत्ता से बाहर होते ही गायब हो जाने वाली हैं, दूसरी तरफ ये लड़कियाँ कहीं रहें, अपनी चमक के साथ रहेंगी। क्योंकि उन्होंने समाज, राजनीति, विचार, इतिहास, भूगोल, संस्कृति सबको पूरे संदर्भ से समझा है।
दक्षिणपंथ महिलाओं को शील्ड की तरह इस्तेमाल करता है, उनके कंधे पर बंदूक रख कर फायर करता है और वामपंथ महिलाओं को फर्स्ट पर्सन बनाता है, उन्हें न्याय-अन्याय, संघर्ष की न सिर्फ समझ देता है, बल्कि उन्हें इस लायक बनाता है कि वे संघर्षों की कमान भी संभाल सकें।
सोशल मीडिया से साभार

जंतर मंतर डायरी
वामपंथ को पसंद करने की एक हजार वजहों में से एक ये भी है कि इसमें स्त्रियाँ सिर्फ बॉयोलॉजिकल या सोशल एंटिटी नहीं है, वे इंटेलेक्चुअल एंटिटी हैं। ठीक-ठीक तफ़सील याद नहीं है, कुछ वक्त पहले एक रील देखी थी, जिसमें बीजेपी की महिलाएँ शायद सपा के किसी सांसद का घेराव कर रही थीं और…
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