सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनोज  मिश्रा और जस्टिस विश्वनाथन की पीठ ने पिछले दिनों अरुणाचल प्रदेश के पास्को एक्ट संबंधित एक मामले में अपना महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। उन्होंने कहा कि अगर कोई नाबालिग अपने साथ हुए यौन शोषण की जानकारी किसी वयस्क व्यक्ति को देती है तो उसका दायित्व बनता है कि पीड़िता की मदद करे। यानी अब  उसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता और बालिग व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है कि वह पीड़िता को न्याय दिलाने में मदद करे। अन्यथा नये संशोधन के अनुसार उस पर भी कानूनी कार्रवाई होगी। इसे आधार बनाकर स्कूल की शिक्षिका पर पोक्सो एक्ट की धारा 30 और आईपीसी की धारा 176 के तहत मुकदमा चलाने की बात कही गई है।
अरुणाचल प्रदेश के एक स्कूल में आठ साल की बच्ची को सीनियर छात्र ने यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया। वह लड़की को बार-बार परेशान करता था। इससे वह डर गई। उसे शारीरिक और मानसिक कष्ट होने लगा। वह स्कूल जाने से भी कतराने लगी। तब उसकी मां को यह सब पता चला।
इसके पहले बच्ची ने अपनी बहन, सहपाठी यहां तक की स्कूल- शिक्षिका को भी यह बात बताई, पर उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। स्कूल वाले भी चुप रहे। मां ने  एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करवायी। पूरी सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट एवं गुवाहाटी हाई कोर्ट ने आरोपी को इस आधार पर छोड़ दिया कि छात्रा के शरीर पर कोई यौन उत्पीड़न के निशान नहीं थे। मां ने हिम्मत नहीं हारी, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी बहस के बाद कोर्ट ने  यह संशोधन पेश किया। इसके अनुसार हर वयस्क व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि ऐसी घटनाओं को कोर्ट ले जाए और उसको न्याय दिलाने में मदद करें। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के निर्णय को खारिज करते हुए नाबालिग लोगों को तो छोड़ दिया, पर महिला- शिक्षिका पर कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
अरुणांचल प्रदेश की इस घटना ने पास्को एक्ट को परिमार्जित किया है। दरअसल, कानून काल सापेक्ष होता है। उसमें समय-समय पर जांचने, परखने और संशोधित करने की जरूरत होती है। हम जानते हैं कि पास्को एक्ट लैंगिक अपराधों से बालकों के संरक्षण संबंधित अधिनियम है। इसे 2012 से लागू किया गया। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों (लड़के -लड़कियां ) को यौन शोषण, लैंगिक उत्पीड़न और सोनोग्राफी से बचाने के लिए यह कानून बनाया गया। इसमें सजा का प्रावधान भी रखा गया। लेकिन 2019 में संशोधन कर धारा 3 और 4 जोड़ा गया जिसके अनुसार बच्चों के साथ होने वाले गंभीर यौन अपराधों में 10 वर्ष की कठोर सजा को  आजीवन कारावास में बदला जा सकता है। पुनः निर्भया कांड के बाद इसमें फिर संशोधन किया गया। जिसके अनुसार  नाबालिग  भी यदि जघन्य अपराध का आरोपी हो तो उसके खिलाफ वयस्कों की तरह की मुकदमा चलाया जाएगा।

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