मेरी पहचान
बहुत दिनों बाद आज आईना देखा
आईने में सामने मैं थी,
थोड़ी हैरान, थोड़ी परेशान,
थोड़ी सी दुखी, थोड़ी सहमती सी,
उम्र की सीढ़ियां चढ़ती, हाँफती सी,
ये उम्र की सीढ़ियाँ थीं,
उन्हें चढ़ती ऊपर जो आ गईं थी,
लगा, कहीं पीछे छूट गई है,
चेहरे की कोमलता,
आंखों की चमक,
रूप का लावण्य,
बचीं है, तो केवल उदासी.
तभी दिल ने याद दिलाया,
पीठ पर साथ चलती गठरी को मैं भूल कैसे गई?,
जिसमें मेरे अनुभवों का ख़ज़ाना है,
यादों का सिलसिला है,
प्रेम के पल हैं,
टूटते दिल की आवाज है,
संभलते क्षण का साहस है,
परिस्थितियों से लड़ने की हिम्मत है,
सृजन का सुख है,
संघर्ष की ताकत है,
गिर कर खड़े होने का आनंद है,
आँसुओं की लड़ी है,
खुशियों की बौछार है,
कितना कुछ है,
ये सब भी तो मेरे चेहरे की लकीरों में मौजूद है,
यही तो मेरी मुकम्मल पहचान है..






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