जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान युवाओं द्वारा बोले गए अपशब्द (गाली) पर अब खुलकर चर्चा हो रही है। किशोर वय के लड़के -लड़कों से सवाल पूछे जा रहे हैं। एक बच्ची हाथ जोर कर, नजरें झुका कर माफी मांग रही है। उसका कसूर यह है कि उसने प्रदर्शन के दौरान सरकार एवं पुलिस के दमनकारी रवैया से खींजकर गाली दे दी थी। ऐसा उसे नहीं करना चाहिए था। लेकिन अगर उसके मुंह से अपशब्द निकल गए, तो इतना भी हाय तौबा मचाने की जरूरत नहीं। वह व्यवस्था के खिलाफ अपने आक्रोश, अस्वीकृति और विरोध की अभिव्यक्ति के लिए इस्तेमाल की गई भाषा थी, जिसे अश्लील, असंस्कृत, अभद्र और गंदा बताया जा रहा है। जबकि ऐसी भाषा तो आज आम भाषा बन गई है। फिर आखिर इसको लेकर इतना गुस्सा क्यों? हर गली चौक- चौराहे, ऑफिस, थाना, दुकान, यहां तक कि घर-परिवारों में आये दिन हम ऐसी भाषा बोलते -सुनते रहते हैं। तब तो इससे कोई नाराज़गी नहीं होती, कोई चर्चा नहीं होती। गाली की संस्कृति पर तरह – तरह के विचार आ रहें हैं। उसकी प्रवृत्ति, उसके तरीके और समाज पर असर की चर्चा हो रही है।
हमारे देश में आरम्भ से ही दो तरह की भाषा रही है – एक अभिजात्य वर्ग के लिए दूसरा सामान्य जन के लिए। वह व्यक्ति के सामाजिक स्वरूप, स्थान, अवसर और भावनात्मक तीव्रता के अनुसार बदलती रहती है। स्कूल की भाषा, संभ्रांत लोगों की भाषा, घरेलू भाषा, सड़कों पर विरोध प्रदर्शन की भाषा अलग होती है। आंदोलित युवाओं की भाषा का रूखापन उनके आक्रोश की सच्चाई को बयां करते हैं।
दरअसल गाली हमारी संस्कृति का ही हिस्सा है। वह हमारे मनोभावों को प्रकट करता है। जैसे हम सुख – दुख, आश्चर्य , विषाद इत्यादि भावनाओं को विभिन्न शब्दों में व्यक्त करते हैं, उसी प्रकार जब हम अपनी कुंठा, गुस्सा, जुगुप्सा या बैर निकालना चाहते हैं तो अनायास हमारे मुंह से वैसे शब्द निकल जाते हैं जो अश्लील, गंदा या गाली के रूप में जाना जाता है। जब हम किसी को किसी को नीचा दिखाना चाहते है, अपनी असफलता और अयोग्यता को छुपाने की कोशिश करते हैं या किसी से बदला लेना चाहतें हैं, तो हम गाली देते हैं। कभी प्रतिशोध स्वरूप तो कभी दबंगई दिखाने के लिए भी हम इसका सहारा लेते हैं।
गाली को हम अच्छा नहीं समझते। इसलिए हम अपने बच्चों को इससे दूर रखना चाहते हैं, पर हम सभी यह भी जानते हैं कि किशोरवय तक पहुंचते- पहुंचते (बल्कि उससे पहले भी) बच्चें अड़ोस-पड़ोस से, खेल-खेल में, हंसी – मजाक में भी गली सीखने लगते हैं, बोलने लगते हैं। यह बात अलग है कि लड़कियों के बीच यह अभी तक उस तरह नहीं बोली जाती जिस तरह लड़कों के बीच। उनके द्वारा गाली सुनने के हम अभ्यस्त हैं। लेकिन लड़की द्वारा खुले आम गाली देना सबको नागवार लगता है। उसकी यह मजाल कि सरेआम गाली दे, वह भी मां-बहन की ! यह क्षेत्र तो पुरुषों के हिस्से का है। यही कारण है कि आज हमें अपनी संस्कृति की याद आ रही है। इस वजह से किसी को गिरफ्तार करने या माफी मंगवाने की घटना मुझे याद नहीं।
क्या आपने पुलिस, अफसर, मालिक, ठिकेदारों को धारा प्रवाह गाली देते नहीं सुना? सत्ता के शीर्ष पर बैठे पक्ष-विपक्ष की भाषा कितनी आपत्तिजनक है हम सब जानते हैं। इन पर किसी ने माफी मांगने को कहा? नहीं। फिर उनके साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है। इसलिए कि वह लड़की है? प्रधानमंत्री महोदय ने पेपर लीक मामले में माफी नहीं मांगी पर उसे माफ करने की बात कहकर इसे चर्चा में ला दिया है। अपशब्द कहने की प्रवृत्ति पर अगर पहले चर्चा होती ,दंड का प्रवधान होता या इस पर रोक लगाई गई होती, तो शायद प्रदर्शनकारी भी ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करतें।
गालियों के केंद्र में महिला का शरीर है। लोग शरीर से जोड़कर गाली देते हैं। जब हम किसी से बदला लेते हैं या किसी से नाराज़ होते हैं, तो उसको भला बुरा नहीं कहते बल्कि उस घर की औरतों से जोड़कर आपत्तिजनक बातें करते हैं। इसके पीछे यह धारणा है कि मां- बहन की गालियां सबसे चोट करने वाली होती है।
आज भी औरत को घर की शोभा, इज्जत माना जाता है, इसलिए किसी को अपमानित करना है तो उसे नहीं, बल्कि उस घर की औरतों को ज़लील करने, उसकी इज्जत की धज्जियां उड़ाने की बात की जाती है।
आज गलियां समाज में धड़ल्ले से बोली जा रही हैं। इसका प्रभाव अभिव्यक्ति के विभिन्न आयामों पर भी पड़ता है। साहित्य, सिनेमा, गाना या टीवी पर प्रसारित विभिन्न चैनलों को देख लें, अश्लील या आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल मिलेगा। साहित्य भी इससे अछूता नहीं। उसे समाज का दर्पण कहा जाता है। वह सिर्फ साफ-सुथरी, पढ़े-लिखे अभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि पूरे समाज का आईना भी होता है, स्वाभाविक तौर पर गालियां इसमें आ जाती हैं। उन्हें हटा दिया जाए तो उसकी जीवंतता, उसकी यथार्थता कम हो जाएगी। चाहे वह राही मासूम रजा, कृष्णा सोबती, काशीनाथ सिंह हो या कोई अन्य।
आज के विभिन्न चैनलों द्वारा जो अश्लील, द्विअर्थी भाषा को परोसा जा रहा है, वह सिर्फ सस्ती मनोरंजन के लिए और भड़काने वाला तो है ही साथ ही घातक भी है। आज की युवा पीढ़ी इसी को देख सुनकर जवान हो रही है। वही बोली सीख रही है, धड़ल्ले से बोल भी रही है। बच्ची ने तो माफी मांग लिया पर समाज कब माफ़ी मांगेगा?






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