भारत की जनसंख्या लगभग 150 करोड में महिलाओं की संख्या लगभग 71.55 करोड है, यानी कुल जनसंख्या का 48.4 फीसदी. फिर भी लोकसभा में 543 सांसदों में महिला सांसदों की संख्या केवल 74 है. 13. 6 फीसदी और राज्यसभा में भी 13 फीसदी महिला सांसद ही है. भारत में वरीय मेनेजमेंट, किसी कंपनी के सीइओ या सेक्रेटरी, या किसी संस्था के अध्यक्ष पद पर महिलाओं का पदस्थापन 2022 – 23 में 15. 7 फीसदी था, तो 2025 – 2026 में 17. 2 फीसदी हुआ. दो फीसदी से भी कम की बढ़ोतरी तीन-चार वर्षों में हुई.
भारत के विश्वविद्यालयों में वायस चांसलर के पद पर मात्र 11 फीसदी महिलाएं पहुंच पाई हैं अब तक. भारत की थलसेना में लगभग 4 फीसदी महिलाएं ऊंचे पद पर, जैसे कोलोनेल, ब्रिगेडियर या उससे ऊंचे पद पर पहुंच पाती है. हवाई सेना में मात्र 13.7 फीसदी और समुद्री सेना में केवल 6 फीसदी महिलाएं उच्च पदों पर पहुंच पाती है.
आगे और लिखा जाय तो यह सूची बहुत बड़ी हो सकती है. इस सूची से इस निष्कर्ष पर तो पहुंचा जा सकता है कि भारत के किसी भी क्षेत्र में महिलाएं ऐसे पदों पर पुरुषों के बराबर नहीं पहुंच पाती हैं जहां वे निर्णय लेने की स्थिति में होंगी.
इसका कारण ढूंढा जाय तो यही लगता है कि भारत की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सरंचना में महिलाओं का स्थान सबसे निचले स्तर पर है. समाज में हमेशा से पुरुष का ही वर्चस्व रहा है. महिलाएं उनके पीछे ही रही है. इसी स्थिति के कारण समाज में, राजनीति में और आर्थिक क्षेत्र में उसका स्थान पुरुष के सहायक के रूप में बनता चला गया. एक परिवार में घर की सारी जिम्मेदारियां महिलाओं की होती है लेकिन घर का मालिक पुरुष होता है और परिवार से संबंधित सारे निर्णय वही लेता है.
एक आजाद देश में, जहां के संविधान ने स्त्री और पुरुष को बराबर के अधिकार दिया है, तो महिलाओं के साथ यह पक्षपात क्यों हो रहा है? क्या महिलाएं अपनी स्थिति के प्रति सचेत नहीं हैं?
महिलाएं सचेत अवश्य हैं और अपने अधिकारों के लिए हर युग में लड़ती रहीं हैं. उसी का परिणाम है कि वे घरों से बाहर निकल पाई हैं. पढ़ लिख कर नौकरियां कर रही है. संसद में पहुंच रही हैं. और अन्य व्यवसायों तथा व्यापार में लगी है. सेना में अपना योगदान दे रही है. लेकिन पुरुष की तुलना में बहुत कम. इसका कारण महिलाएं नहीं हैं.
महिलाओं की इन उपलब्धियों के बावजूद अभी भी महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर समझा जाता है. स्त्री का संरक्षक घर का पुरुष ही हो सकता है. यही कारण है कि बिहार के जमुई में एक नाबालिग लड़की अपने साथी के साथ शाम को सड़क पर दिख गई तो लोगों को नागवार गुजरा. उससे प्रश्न पूछे जाने लगे. अन्य पुरुषों को उसके शरीर को छूने का, उसको घायल करने का, अपमानित करने का अधिकार मिल गया. दिल्ली जैसे महानगर में भी एक नाबालिग लड़की को अपने साथी के साथ पार्क में बैठे देख कर तीन अन्य पुरुषों ने उसके इस दुस्साहस का दंड उसका बलात्कार करके दिया.
हरियाणा के हिसार जिले के एक गांव मे लडकियों का प्रेम विवाह करना ही लोगों को गलत लगा तो अपने गांव में उन्होंने प्रेम विवाह पर रोक लगा दी. लगभग एक हजार लोगों की सभा में यह निर्णय लिया गया कि सामाजिक तानाबाना बनाये रखने के लिए लड़कियों को प्रेम विवाह करने से रोकना ही होगा. गांव की हर एक बेटी सबों की बेटी है. इस तरह बेटियों को अपने जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है. इसी हरियाणा की बेटियां जब कुश्ती जैसी प्रतियोगिता में अंतर्राष्ट्रीय पदक लाती है तो वह उनके लिए और देश के लिए गर्व का विषय होता है. वे ही लडकियां यदि कुश्ती संघ के प्रमुख के द्वारा शारीरिक शोषण के विरुद्ध जंतर-मंतर पर धरना देती हैं तो कोई उसका साथ नहीं देता है. बेटों के प्रेम विवाह पर शायद उन्हें कोई आपत्ति नहीं है.
क्या भारतीय समाज को सडक पर निकली नेहा, आकृति नहीं दिख रही हैं जो अपनी लडाई नहीं लड रही है, लोकतंत्र को बचाने में लगी हैं. मजदूरों की लडाई लड रही है. जेल जा रही हैं. अंजली भरद्वाज नहीं दिख रही है जो वोटरों की लडाई लड रही है और लगातार सरकार से प्रश्न पूछ रही है. और फिर रुचिका, जिसने चुनाव आयोग के द्वारा एसआईआर में की जा रही धांधलियों को उजागर करते रिपोर्ट को लिखकर करोडो वोटरों का साथ दिया. ये महिलाएं कैसे साहसी नहीं है या पुरुषों के समकक्ष नहीं है? जरूरत है केवल समाज का नजरिया बदलने का.






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