जमुई (बिहार) में बीते 19 सितंबर को एक युवा/किशोर जोड़े के साथ जो हुआ, वह कोई अनोखी घटना नहीं है! अनोखी और चिंताजनक बात है ऐसी घटना पर समाज का संवेदहीन बना रहना. जब उस लड़की के साथ कुछ गुंडे बीच सड़क पर शर्मनाक हरकत कर रहे थे, तब भी राहगीरों का हस्तक्षेप करने के बजाय, उसे बचाने का प्रयास करने के बजाय, चुपचाप गुजर जाना! शायद हम सबकी आदत पड़ गयी है! हमारा समाज एक बीमार समाज हैं!
उस घटना को लेकर पक्ष- विपक्ष में आरोप और पलटवार का सिलसिला जारी है, चलता रहेगा. गुंडों की जाति और उनका किसी दल से कनेक्शन भी खोजा जा रहा है! लेकिन इसकी जड़ में समाज की स्त्री विरोधी मानसिकता, जिसे धर्म की स्वीकृति हासिल है, उस पर कोई चर्चा नहीं होती, नहीं होगी! बेशक इस मामले में कोई धर्म या धार्मिक समाज अपवाद नहीं है! लेकिन आप दूसरे धर्मों में खोट निकालने के पहले अपने धर्म को तो देख लो! “पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने; रक्षन्ति स्थविरे पुत्राः, न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥“ अर्थात बचपन में पिता रक्षा करता है, जवानी में पति, बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करते हैं। (मनुस्मृति; अध्याय 5, श्लोक 148). स्त्री को आजीवन किसी के अधीन या संरक्षण में रहना है, यह धारणा आयी कहां से? एक बच्ची को किनसे खतरा है कि उसे संरक्षण चाहिए? क्या हमने मान लिया है कि पुरुष तो नहीं ही सुधरेगा!
भारतीय/सनातन संस्कृति में नारी मात्र के सम्मान की परंपरा का दावा करते हुए कुछ लोग झट एक शोक सुना देते हैं- ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।‘ अर्थात- जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता रमते हैं। मगर स्त्री को चरित्रहीन-चंचल बताने वाले श्लोक भूल जाते हैं-
“पुंश्चलं च चलचित्तं च नैःस्नेह्यं च स्वभावतः।/ रक्षितं यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेतद् विकुर्वते।। (9.15-16 का हिस्सा) अर्थ- ‘पुरुषों के प्रति चंचलता, चित्त की अस्थिरता और निस्नेहता (हृदय की कठोरता) स्त्रियों में स्वभाव से है, इसलिए यत्न से रक्षित होने पर भी वे पति के विरुद्ध आचरण कर देती हैं।‘ एक अन्य श्लोक का अर्थ है- ‘इस लोक में पुरुषों को दूषित करना (लुभाना) स्त्रियों का स्वभाव है, इसलिए विद्वान स्त्रियों के विषय में कभी असावधान नहीं होते।‘ (2.213)
इसी धारणा का असर महू (इंदौर) की भाजपा विधायक और मध्य प्रदेश की पूर्व मंत्री उषा ठाकुर के एक चर्चित बयान में झलकता है- उन्होंने कहा है कि हर साल नवरात्रि में गरबा के दौरान 4.5 लाख हिंदू लड़कियां, विधर्मियों के साथ भाग जाती हैं. यह भी कि ये 4.5 लाख लड़कियां साल भर में 9.5 लाख बच्चे पैदा करती हैं, जिसकी वजह से डेमोग्राफी बदल रही है. उषा ठाकुर के बयान का सीधा मतलब यही है कि हिंदू लड़कियां बदचलन होती हैं!
इसी कारण ऐसी हर घटना के बाद पीड़ित लड़की को नसीहत दी जाती है, अनेक सवाल पूछे जाते हैं- इतनी शाम को घर से निकली ही क्यों? ऐसा ड्रेस क्यों पहन रखा था? एक अनजान लड़के के साथ क्यों थी? उस रास्ते से क्यों जा रही थी? मालूम नहीं है कि अपराध कितना बढ़ गया है? वही मां-बाप अपने बेटे को संस्कार देने की जरूरत नहीं समझते कि किसी महिला से कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह बताना जरूरी नहीं समझते! अरे लड़का है… वे गुंडे भी तो इसी समाज के हैं! उनको यह अधिकार किसने दे दिया कि किसी युवक युवती को साथ देखें, तो उनसे पूछताछ करने लगें? हाँ, वे प्रेमी-प्रेमिका हैं, तो? तुम कौन हो उनको नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले; उनको सजा देने वाले!
सच यह भी है कि इस तरह के अपराध को पूरी तरह से रोकना पुलिस के बूते का नहीं है. इतनी पुलिस है भी नहीं कि कदम कदम पर पुलिसकर्मी खड़ा रहें. भारत में कुल पुलिस बल 197 प्रति लाख स्वीकृत है, लेकिन वास्तव में ड्यूटी पर 137-153 प्रति लाख ही होती है. यह और बात है कि आम पुलिसकर्मी में भी यह संस्कार नहीं है कि औरतों से कैसे व्यवहार करें. किसी युवती को अपने पुरुष मित्र के साथ देख कर वे भी लड़की को नसीहत देने लगते हैं! मगर सच यही है कि पुलिस चाहे भी तो ऐसी घटनाओं को रोक नहीं सकती. पुलिस और सरकार का इकबाल हो, तो ऐसे छिछोरे भी डरते हैं! वैसे जमुई/बिहार पुलिस एक हद तक शाबासी की हकदार भी है कि उसने उस कांड में लिप्त तीन शैतानों को दबोच लिया!
मूल रूप से यह समस्या समाज की है. सरकारी आंकड़ों (मई 2026 में जारी एनसीआरबी की 2024 रिपोर्ट) के अनुसार देश में प्रतिदिन दुष्कर्म के औसतन 80 मामले दर्ज होते हैं, यानी हर 18 मिनट में एक! 2024 में महिलाओं के खिलाफ कुल अपराध 4,41,534 दर्ज हुए- यानी रोज 1,210 मामले!, हर 71 सेकंड में एक अपराध. गौतलब है कि इसमें सबसे ज्यादा केस पति/रिश्तेदार द्वारा क्रूरता (1,20,227), फिर अपहरण और रेप का नंबर आता है. 96.8 फीसदी रेप केस में आरोपी पीड़िता का जानने वाला था, अनजान हमलावर वाले केस सिर्फ तीन प्रतिशत हैं!
समाज ऐसा क्यों बन रहा है, यह सोचने की जरूरत है. लड़के क्यों इतने बदमाश, खास कर लड़कियों के प्रति इतने आक्रामक हो रहे हैं, यह हर नागरिक, खास कर समाज के पुरोधाओं के सोचने का विषय है! पिछले एक दशक से तो धर्म-कर्म, भजन- कीर्तन, कांवड़ यात्रा में ही उनका अधिक समय बीत रहा है, तब भी यह हाल है? यह धर्म का यह असर है, तो उस धर्म को सुधारो या तौबा करो ऐसे धर्म से!
वैसे जमुई की इस घटना पर कुछ बोलने का मतलब हिंदू समाज और धर्म का अपमान भी हो सकता है! आप भागवत जी के इस दावे पर ताली बजा सकते हैं, इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हिंदू असहिष्णु नहीं हो सकता, कि हिंदू समाज में स्त्री मात्र का सम्मान करने की परंपरा है! इतनी सी बात को इतना तूल भी नहीं देना चाहिए!
सरकार किसी दल की हो, बहुत फर्क नहीं पड़ता! फिर भी बिहार में अभी तो पहली बार नारी मात्र का सम्मान करनेवालों की सरकार बनी है! देश और बिहार में कुछ भी, कितना भी बुरा हो जाये, सत्ता पक्ष के पास बचाव का ठोस तर्क रहता है- नेहरू/इमरजेंसी और ‘जंगल राज’! मगर सच यह भी है कि जब से देश में ‘नारी शक्ति वंदन’ की धूम हुई है, ऐसी घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ गयी हैं. रोज अखबार में ऐसी खबरें मिल जाती हैं! यह केवल बिहार का मामला भी नहीं है! दुखद यह कि समाज के कर्णधारों को इसका एहसास भी नहीं है! और चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाएं बिहार सहित पूरे देश में बढ़ती जा रही हैं! क्या अब भी समाज का जमीर जगेगा? क्या ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ एक नारा बन कर ही रह जाएगा? या यह भी ‘सुशासन’ और ‘जंगल राज’ की बहस का एक और प्रसंग बन कर रह जाएगा?
पूरे समाज को शर्मसार करने वाली इस घटना का एक सकारात्मक पक्ष भी है- उस लड़की का दोस्त उसके साथ डटा रहा! बिहार और देश के, खास कर हिंदू युवकों के पास दो विकल्प है- या तो उन दरिंदों जैसा बने; या उस लड़की के दोस्त जैसा, जिसने उतने वहशी गुंडों से घिरे होने पर भी अपनी महिला मित्र का साथ नहीं छोड़ा; भरसक मुकाबला करता रहा! उस किशोर/युवक को सलाम!






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