मैं, डॉ रत्ना बनर्जी हूँ। रांची मेरी पसंदीदा जगहों में एक है। केवल इसलिए नहीं, कि यह मेरा जन्मस्थान है, बल्कि यहाँ की संस्कृति, यहाँ की जीवन शैली की आत्मीयता, सुखद सहज वातावरण की उपलब्धता इसे आपको अपना मानने को विवश कर देती हैं। मैं रांची के निर्मला कालेज के इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष के पद से सेवा निवृत्त हो चुकी हूँ, लेकिन आज भी मेरी कर्म भूमि, जीवन की धूरी, सामाजिक कामों का केंद्र रांची ही है।
मैं मानती हूँ कि अच्छे कर्म इंसान में जागरूकता पैदा करते हैं। उसके विचार, उसके व्यवहार, उसके व्यक्तित्व में निखार लाते है। उसका आत्मविश्वास, उसकी बुद्धि एवं साहस उसे सुदृढ़ बनाते है। और व्यक्ति खुद को सही ढंग से पहचान पाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। मैं यहां उन बातों को आप लोगों के सामने पेश कर रही हूं।
बीसवीं सदी के अस्सी के दशक से बिहार के रांची सहित कई शहरों एवं गांवों में बौद्धिक एवं मानसिक परिवर्तन तथा जागरण की आहट सुनाई पड़ रही थी। समाज के नारी और पुरुष मानों सदियों से ढो रहे पारंपरिक वर्जनाओं को,  कुसंस्कारों को,  नारी के प्रति दमनकारी रीति-रिवाजों के शृंखलाओं को तोड़ कर, एक स्वस्थ, प्रगतिशील समाज-व्यवस्था तथा परिवार प्रथा बनाने के लिए सक्रिय होने लगे थे। वे लोग इन मुद्दों को केंद्र में रख कर, इनके खिलाफ काम करने के लिए समितियां एवं संस्थाएं बना कर संगठित हो रहे थे। वे लोग महिलाओं को सम्मान मिले, पुरुषों के साथ बराबरी के अधिकार के पक्ष में काम कर रहे थे। एक ओर उन लोगों को समर्थन, सहयोग मिल रहा था,  तो दूसरी ओर बाधाएं, कटु आलोचनाएं भी झेलनी पड़ रही थी। सबसे अधिक बाधाएं पितृसत्ता के कारण अपने परिवारों की ओर से झेलना पड़ रहा था। ऐसा लग रहा था मानों महिलाओं को स्वतंत्रता मिलने से, पूर्ण मनुष्य का अधिकार या व्यक्ति का अधिकार मिलने से, दुनिया रसातल में डूब जायेगी।
महिलाओं का यह सामाजिक आंदोलन कई बार डगमग करते हुए भी एक सशक्त आन्दोलन बन कर उभरा। इसका एक कारण था, इस आंदोलन की नेतृत्व कारी साहसी महिलाओं की अपने आंदोलन के प्रति निष्ठा, जिसके परिणामस्वरूप  महिलाओं के सशक्तिकरण का कर्म यज्ञ फैला। कई पुरुषों ने भी इसमें सहयोग दिया, जिससे इस कर्म यज्ञ को सफलता मिली। मैंने खुद देखा और सुना कैसे कोई ग्रामीण महिला, जो अपना नाम भी ठीक ढंग से नहीं बोल सकती थी, वे ऐसी संस्थाओं के साथ जुड़ कर, कुछ दिनों के बाद, बिना संकोच के अपनी बातों को पेश करने लगी।
ऐसे कर्म यज्ञ के नेत्री, निस्वार्थ रुप से, अथक परिश्रम कर सैकड़ों महिलाओं के हृदयों में एक नया जज्बा पैदा कर सकी थीं। ठीक जैसे एक दीपक से कई -कई दिशाओं को आलोकित किया जा सकता है। मेरे उपर भी इन विचारों का, कार्यक्रमों का, लोगों का काफी प्रभाव पड़ा। कालक्रम में मैंने भी खुद, दो संस्थाओं को बनाकर, समाजसेवा का काम किया और खुद के अंदर की शक्ति को पहचाना। कहा जा सकता है कि आविष्कार किया। मैं विश्वास करती हूं कि ‘आग’ सभी महिलाओं में है, बस उन्हें उसका सही ढंग से प्रयोग करने की दिशा दिखला देना जरूरी है।
सबको जोहार.  

Leave a Reply

Trending

Discover more from संभवा इंजोर

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading