एक
अवशेष
संगीता कुजारा टाक

उसने
ठान रखा था
जमाने के आगे न झुकने का
नहीं देखा किसी ने
उसकी तनी हुई भौहों की
नीचे की उदासी,
तड़पती पुतलियाँ,
सुखे आँसुओं में
उसके सपनों का हरियालापन…
नहीं देखा किसी ने
उसके हृदय का
अल्हड़पन
उसकी चंचलता
उसकी मासूमियत
और सपने पूरे हो जाने की आस….
लोगों को दिख रहा था
बस
उसका अवशेष

दो
स्त्री क्या चाहती है
किरण

वह अपने लिए कोई रियायत नहीं चाहती है,
वह सामाजिक समता का राग चाहती है,
समाज से आँख में आँख डाल कर प्रश्न करना चाहती है,
समाज के ढोंग को बेनकाब करना चाहती है,
कोई अनावश्यक दवाब नहीं चाहती है,
न सड़क छाप मजनुओं से डरना चाहती हैं,
दहेज, बलात्कार जैसे अपराधों से लड़ना चाहती है,
उन्हें मिटाना चाहती है,
बेहतर पत्नी, एक अच्छी माँ, एक प्यारी बहन तो बनना चाहती है,
लेकिन उसके पहले एक अच्छा इंसान,
एक अनुशासित नागरिक बनना चाहती है,
अपने लिए शिक्षा -रोजगार चाहती है,
अपने सोच का, विचार का, निरंतर विस्तार और विकास चाहती है,
समाज की दृष्टि में अपने लिए एक सम्मानजनक जगह चाहती है,
भयमुक्त वातावरण चाहती है,
एक सहज जीवन चाहती है.

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