महिला दिवस हर वर्ष उत्साह से मनाया जाता है, और इसकी प्रासांगिकता भी है. लेकिन यह भी एक कठोर यथार्थ है कि हमारे समाज में ही महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा इस तरह के कार्यक्रमों से निर्लिपत रहता है, क्योंकि उनके लिए इन कार्यक्रमों से ज्यादा महत्वपूर्ण रहता है जीवन का संधर्ष. हम चाह कर भी उन्हें जोड़ नही पाते. आईये आपको हम ऐसी कुछ महिलाओं से मिलाते हैं.
अब अलीशा मुंडा की मां सुबह खाना पीना कर, बच्चों को स्कूल भेज कर अपना छोटा सा खेत अगोड़ने चली जाती है. नदी के किनारे थोड़ी सी जमीन पर उन्होंने घेर घार कर कुछ सब्जियां लगा रखी हैं. बैगन, आलू, टमाटर, मिर्च, लहसुन आदि. बेचना नहीं है, बस घर की जरूरत को पूरा करने के लिए. तो दिन का ज्यादा वक्त वहीं बीतता है.
मेधनी तीन बहनें और एक भाई है. खेत तो रहे नहीं, सभी कुछ न कुछ करते हैं. मेधनी कहीं काम करती है. इधर उसने एक घर में और काम पकड़ लिया है. उस घर में किसी का आपरेशन हुआ है. परिजन सेवा नहीं कर पा रहे. मेधनी से कहा गया तो मान गयी. शायद यह सोच कर भी कि सरहुल आने वाला है, कुछ अतिरिक्त कमाई हो जायेगी तो नये कपड़े वगैरह खरीद पायेगी.
अंशु के पिता जी पैर जख्मी कर बैठे. काम नहीं कर पा रहे हैं. उसने एक माल में काम पकड़ लिया ताकि इस मुश्किल की घड़ी में घर में कुछ मदद हो जाये. हालांकि उसे जल्द ही कई तरह की प्रतियोगगिता परीक्षाएं देनी है. तत्काल जरूरत है. कर लिया काम.
जया दो वर्षों से केरल के मसाला बगानों में काम कर रही थी. पैसा कमा कर लौटी है. उन पैसों से यहां डैम साईड में एक छोटा सा घर बनायी है. अब यहां पेट्रोल पंप में काम करती है. घर चलाना है. एक भाई पढ़ता है, उसे पढ़ाना है. सुबह जाती है तो दो बजे तक लौटती है. उससे क्या कहूं, महिला दिवस है. तरह तरह के कार्यक्रम हो रहे हैं. किसी में भाग लो.
एक बच्ची की मां जिस पुरुष के साथ पिछले कुछ वर्षों से रहती थी, उसे छोड़ कर बस्ती में ही दूसरा घर ले लिया है. उसका कहना है कि उसके पहले पति की बेटियों को यह आदमी बोझ समझने लगा है. उसके साथ नहीं रहेगी. वह खट कर अपना और अपनी बेटी का पेट पाल लेगी. हर दिन रेजा का काम करती है. हर दिन मशक्कत का.
अब आप ही कहिये कि इन आत्मनिर्भर, आत्मसम्मान से जीने वाली इन सबों को महिला दिवस की महत्ता कैसे समझाया जाये और कैसे कहा जाय कि अपना काम काज छोड़ महिला दिवस मनाने चलो?
एक बात और गौरतलब है कि महिला आंदोलनों की वजह से महिलाओं ने जो अधिकार प्राप्त किये भी हैं, उनमें से कुछ तो सबों के लिए हैं, लेकिन ऐसी बहुत सारी उपलब्धियां हैं, जो महज संगठित क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं तक सीमित रह गयी है. मसलन, औरत मर्द की समान मजदूरी, साप्ताहिक अवकाश, मातृत्व अवकाश आदि. उन तक भी ये अधिकार पहुंचने चाहिएं और यह महिला मुक्ति आंदोलन का संकल्प होना चाहिए.

Leave a Reply

Trending

Discover more from संभवा इंजोर

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading