लगभग आठ-दस वर्षों बाद एक बार फिर से केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के संदर्भ में निषेधों की चर्चा आम हो रही है। सुप्रीम कोर्ट में इससे संबंधित सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने मामले को और गंभीर बना दिया है। सबरीमाला मंदिर समेत सभी धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को भी सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार उसके पास है। केंद्र ने दलील दी थी कि धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे का फैसला नहीं कर सकती, क्योंकि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं।
सवाल है- क्या अंधविश्वास’ को ‘आस्था’ कहा जा सकता है? अंधविश्वास और आस्था में कोई अंतर है?
एक तरफ समाज महिलाओं को कमतर आँकता रहता है, वे खुद सामाजिक रीति रिवाजों को आत्मसात किए बैठी हैं, क्योंकि कई बार देखने में आता है कि ज्यादातर पढ़ी-लिखी, ऊंचे पदों पर आसीन, ‘आधुनिक’ मानी जाने वाली महिलाएं, तीज और करवा चैथ का व्रत करती ही हैं! खास अवसरों पर पति का चरण स्पर्श भी करती हैं! ‘सुहागन’ की महिमा होगी तो विधवा ‘अशुभ’ भी होगी! ‘दूधों नहाओ, पूतों फलो’ का ही आशीर्वाद देने की परंपरा है। उनके ‘संस्कार’ में पति परमेश्वर की धारणा गहरे जमी हुई है।
धार्मिक मान्यताएँ मानती हैं कि समाज में स्त्री का स्थान दोयम है। हिंदू समाज इस संदर्भ में ‘विलक्षण’ है। यदि इस सृष्टि की रचना ’ईश्वर’ ने की है, जैसी कि मान्यता है, तो उसी ने सृष्टि की निरंतरता के लिए स्त्री और पुरुष बनाया, प्रजनन के लिए स्त्री का रजस्वला होना भी उसी ने तय किया होगा! तो उसी ’ईश्वर’ के घर में रजस्वला स्त्री का प्रवेश निषिद्ध कैसे हो गया! वह भी सभी मंदिरों में नहीं। काशी, अयोध्या और मथुरा में ऐसा निषेध नहीं है। जाहिर है, राम, कृष्ण और शिव को उनसे कोई दिक्कत नहीं है। तो ‘सबरीमाला’ वाले देवता को क्या कष्ट है? बात यह है कि सबरीमाला के देव ब्रह्मचारी है। अगर किसी देवता को अपने ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करना है, तो उन्हें महिलाओं से बचने की जरूरत होती है, और उनके ब्रह्मचर्य को बचाए रखने की जिम्मेवारी महिलाओं पर ही आती है। न वे उनके सामने जाएंगी, न उनका ब्रह्मचर्य टूटेगा। पहले मंदिर प्रशासन की तरफ से यह निषेध सभी महिलाओं के लिए लागू था, अर्थात मंदिर में महिलाओं का प्रवेश ही वर्जित था। लेकिन बाद में एक रास्ता निकालते हुए इसे 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के लिए निषेध माना गया। अर्थात रजस्वला की उम्र की महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगी।
विडम्बना यह है कि हिंदू समाज की अधिसंख्यक महिलाएं भी मानती हैं कि सामाजिक भेदभाव तो ‘ईश्वरीय’ विधान है! और उसके अनुसार उन्हें अपने राजस्वला के समय भगवान के पास नहीं जाना चाहिए, पूजा नहीं करनी चाहिए। लेकिन अगर कुछ स्त्रियाँ, जो इस प्रजातांत्रिक देश की नागरिक हैं, जिन्हें भारत के संविधान ने समानता का अधिकार दिया है, धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार दिया है, अगर वे अपने आराध्य की पूजा- अर्चना करना चाहती है, तो उन्हें ऐसा करने से रोकना अपराध नहीं है क्या? भारतीय समाज का यह कैसा रुप है, जो इन महिलाओं को उनके प्राप्त अधिकारों को एक बार फिर से प्राप्त करने के लिए कोर्ट के निर्णयों पर आश्रित होने की बात करता है, और कोर्ट के निर्णय आने के बाद भी सामाजिक मान्यताएँ, परंपराएँ उसे मानने से उन्हें रोकती हैं। यह इस तथ्य को उजागर करने के लिए काफी है कि पितृसत्ता का आधिपत्य, राजनीतिक सत्ता, आर्थिक सत्ता के साथ ही साथ धार्मिक सत्ता पर भी पूरी तरह से कायम है।

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