महिला का अपने शरीर पर अधिकार उसकी गरिमा का हिस्सा है और नाबालिग बलात्कार पीड़ितों की इच्छा के विरुद्ध उन पर गर्भ नहीं थोपा जा सकता, यह कहना है सुप्रीम कोर्ट का। कोर्ट मई 2026 को नाबालिग लड़की के अनचाहे गर्भ को खत्म करने संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान फैसला सुना रही थी।
मां बनना महिला के जीवन का बेहद खूबसूरत, परिवर्तनकारी और भावुक पड़ाव होता है। लेकिन कई बार गर्भधारण एवं मां बनना एक अभिशाप भी बन जाता है। पिछले दिनों 15 वर्षीय बच्ची की कहानी यही बयां करती है। कानून के दांव-पेंच, सामाजिक मान्यताओं एवं परिवार के आन-बान में उलझ कर अंततः समय से पहले यानी 7 माह के शिशु को जन्म लेना पड़ा। जबकि अदालत के चार न्यायाधीशों के बहुमत ने गर्भावस्था को जारी रखने की अनुरोध दिया था जिसे  नाबालिग बच्ची के माता-पिता ने  स्वीकार नहीं किया. 2 मई को 29 सप्ताह और 2 दिन के गर्भावस्था के बाद शिशु का जन्म हुआ। आज वह बच्चा एम्स के नवजात गहन चिकित्सा कक्ष में है। डॉक्टर के अनुसार उसे तीन- चार सप्ताह तक अस्पताल में रहना होगा। चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ होने पर उसे बाल कल्याण समिति  को सौंप दिया जाएगा। याचिका कर्ता ने बच्चों को गोद लेने और उसके देखभाल करने की इच्छा जताई थी, पर ऐसा संभव नहीं हो सका।
हमारे देश में 20 सप्ताह तक गर्भपात को कानूनी स्वीकृति मिली है। बलात्कार, नाबालिक, मानसिक रूप से विक्षिप्त या वैवाहिक स्थिति में बदलाव (तलाक,विधवा) जैसी विशेष श्रेणी की महिलाओं के लिए 24 सप्ताह तक गर्भपात की इजाजत दी गई है। इसके लिए दो डॉक्टरों की स्वीकृति आवश्यक होती है। इसके अलावा भ्रूण में किसी तरह की बीमारी या विकृति की पुष्टि होने पर डॉक्टरों द्वारा 24 सप्ताह के बाद भी गर्भपात की अनुमति दी जाती है। यह 2021 में संशोधन के बाद तय किया गया। अब इस केस के बाद अवधि को और अधिक बढ़ाये जाने का संकेत मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि सरकार इस पर कोई ठोस निर्णय ले, जिससे अनचाहे गर्भ  से मुक्ति मिल सके। वह मानता है कि किसी भी लड़की पर अनचाही प्रेगनेंसी सही नहीं है और आखिरी फैसला पीड़िता और उसके माता-पिता का ही होगा। संभव है इस अवधि को 30 हफ्ते या उससे भी ज्यादा बढ़ा दिया जाए।
न्यायमूर्ति बीबी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां की पीठ ने कहा कि अगर किसी महिला को अवांछित गर्भावस्था को जारी रखने को मजबूर किया गया तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा और उसे गंभीर मानसिक भावनात्मक और शारीरिक आघात भी पहुंचेगा। उनके अनुसार भ्रूण का जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बच्ची का जीवन है।
पूरे प्रकरण से कई सवाल उठाते हैं तो कुछ प्रश्न उलझे रह जाते हैं। जैसे – बच्ची (पीड़िता) की इच्छा की जानकारी नहीं होना, परिवार का इतने दिनों तक अनदेखा करना, शिशु का भविष्य, कानून की सीमा और वास्तविक स्थिति- कई सवाल हैं.. आखिर क्यों गर्भधारण की अवधि इतनी लंबी हो गई कि गर्भपात एक संकट का कारण बन गया। यदि समय रहते गर्भपात कर दिया जाता तो शिशु  परिपक्व नहीं होता और ना यह एक संवेदनशील मुद्दा बनता। अगर माता-पिता विवाह कर देते तो? आज  भले ही कानून बन गया हो कि बालिग होने के बाद ही गर्भधारण हो सकता है, पर हम सभी ने देखा है कि नाबालिक भी एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है, देती है और  स्वस्थ रह सकती।
इस केस में यह भी स्पष्ट है कि संबंध आपसी सहमति से बने थे। लेकिन कानून की नजर में नाबालिग लड़की से संबंध बनाना रेप की श्रेणी में ही आता है। यहां लड़का भी नाबालिग है। कानूनी प्रावधानों को छोड़ दें तो हम सभी जानते हैं और आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में अभी भी 23 फीसदी महिलाओं की शादी 18 वर्ष के पहले कर दी जाती है और स्वाभाविक तौर पर लड़कियां गर्भधारण भी करती है। सवाल सिर्फ कानून बनाने का नहीं बल्कि उसे सामाजिक स्वीकृति दिलाने एवं पालन कराने का भी है।

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