विगत दस बारह वर्षों से, जब से बीजेपी का शासन चल रहा है ‘महिला सशक्तिकरण’, ‘मातृ वंदन’ जैसे शब्द बहुत प्रचलन में आ गये हैं. उनके अनुसार महिलाएं पुरुषों से कमजोर हैं. महिलाओं के साथ हिंसा , अत्याचार, बलात्कार की घटनाएं उनके कमजोरी का ही परिणाम है. इसलिए महिलाओं को सशक्त करना सरकार अपना कर्तव्य मानती है. सशक्तीकरण का अर्थ उसकी दृष्टि में महिलाओं को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाना है. महिलाओं के बैंक खातों में कुछ पैसे डालकर वह अपने कर्तव्य को पूरा करती है. चुनाव के समय तो यह सशक्तिकरण की राशि और बढ़ जाती है. बिहार विधानसभा चुनाव के समय महिलाओं के खातों में दस हजार रुपये डाले गये और उसके एवज में उनसे अपने प्रत्याशी के लिए वोट डलवाया गया. अब तो 2027 में उत्तर प्रपेश के चुनाव में महिलाओं के खाते में पचास हजार डालने की बात हो रही है जिससे बीजेपी की जीत सुनिश्चित हो जाय. यह है महिला सशक्तिकरण का बीजेपी फार्मूला.
लेकिन आधुनिक युवा लडकियां बीजेपी के इस फार्मूले को नकारती हैं. उनका कहना है कि वे भी मनुष्य है. उनके पास भी दिल-दिमाग है और वे उसका उपयोग करना जानती है. साथ ही उनके पास भी शारीरिक ताकत है और वे पुरुषों के बराबर इसका उपयोग कर सकती है. अपने इस कथन को उन्होंने सच भी साबित किया.
इसी वर्ष जुलाई में जंतर मंतर का वह धरना हुआ जो पचीस दिन चला. उन पच्चीसों दिन लड़कियां लड़कों के बराबर ही भाग लेती रहीं, पुलिस की ज्यादतियां झेलती रहीं. आइसा की नेहा बोरा ने अपने दो पुरुष साथियों के साथ तेइस दिन का भूख हडताल किया और शिक्षामंत्री धर्मेंद प्रधान के इस्तीफे के बाद ही अपना अनशन तोड़ा. उसी धरने में हजारो लडकियां अपने नारों के साथ सडक पर निकल पडी. यह भारतीय समाज तथा वर्तमान सरकार के लिए भी एक अजूबा ही था.
23 सितंबर सुबह इंडियन एक्सप्रेस अखबार के पहले पृष्ठ पर का मुख्य समाचार ने चुनाव आयोग के पोल को खोल कर रख दिया. इस रिपोर्ट को लिखने वाली थी रूचिका चोपड़ा. उसके इस रिपोर्ट ने तो मानों धमाका कर दिया था. भारत के लोग तो एसआईआर में हो रही गडबाडियों को देख रहे थे अनुभव भी कर रहे थे. लेकिन आयोग के अंदर ही मुख्य चुनाव आयोग अपने अन्य दो सहयोगियों के विरोध को नजरंदाज कर अपनी मनमानी कर रहे थे और देश के तेरह करोड लोगों को वोट देने के अधिकार को छीन लिया था, इसका स्पष्ट चित्र लोगों के सामने लाने का श्रेय रुचिका चोपड़ा को ही जाता है. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही राहुल गांधी चुनावी व्यवस्था और उसमें हो रही धांधलियों को सबूत समेत लोगों के सामने ला रहे थे. उन्होंने कर्नाटका, हरियाणा और मध्य प्रदेश चुनावों की गडबडियों को लोगों के सामने लाया. लेकिन लोग उससे उतना उद्वेलित नहीं हुए जितना कि रुचिका चोपड़ा के इस रिपोर्ट से हुए.
सारा विपक्ष सामूहिक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने, जांच करने तथा सजा देने की बात करने लगा. उन्होंने छः अक्टूबर से जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने तथा मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने का कार्यक्रम बनाया. कॉक्रोच जनता दल के लोगों ने भी 2 अक्टूबर को मुंबई में प्रदर्शन करने तथा बाद में जंतर मंतर में भी अपने कार्यक्रम को जारी रखे का एलान किया. सबों की मांग एक ही थी कि मुख्य आयुक्त त्यागपत्र दें, आयोग की गड़बड़ियों की जांच हो और मुख्य आयुक्त को सजा हो.
सीजेपी के मुंबई प्रदर्शन तथा दस अक्टूबर के दिल्ली प्रदर्शनमें महिलाओं ने बढ़चढ़ कर भाग लिया. शिवाजी पार्क प्रदर्शनकारियों के लिए बंद कर दिये जाने के कारण उसे गेट के बाहर सड़क पर ही प्रदर्शन हुआ. लेकिन 6 अक्टूबर तथा 12 अक्टूबर के इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन में भाग लेने वाले लाखों लोगों में लडकियों की संख्या बहुत अधिक थी और इनको नियंत्रित करने के लिए दिल्ली की सड़कों पर चालीस हजार पुलिस तथा पारा मिलटरी के जवान थे, जिन्होंने लडकियों को सड़कों पर घसीटा, उन्हें जबरदस्ती बसों में चढ़ा कर ले गये. महिला पत्रकारों को भी रिपोर्टिंग से रोकने के लिए उनको ठेला गया और उनके वक्ष को छूने जैसी घटिया हरकत भी पुलिस ने की. लेकिन महिलाएं इन हरकतों से घबराने के बजाय कैमरे के सामने इसका खुलासा किया और न्याय के लिए कोर्ट भी गयीं.
लड़कियों ने प्रदर्शनों के दौरान नये-नये नारे भी दिये, जैसे ‘एक कचौडी दो समोसा, ज्ञानू तेरा क्या भरोसा’, ‘मैं अपने आपकी, नहीं किसी के बाप की’, ‘मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है’, जो भारतीय लडकियों के स्वाभाव के प्रतिकूल माना गया और जो तथाकथित भद्रजनों की समझ से अश्लील भी थे. अश्लील हो सकते हैं लेकिन इन नारों को बोल कर उन्होंने कोई .अपराध नही किया. जिस तरह का अपराध संवैधानिक पद पर बैठे ज्ञानेश कुमार ने किया. औरत होने का जो निम्नता का बोध उनमें बचपन से ही डाला गया, उसे उन्होंने त्याग दिया और अपना एक सहज रूप दिखाया. यह स्वागत योग्य तो है.
महिलाओं को मातृतुल्य माननेवाली बीजेपी ने अपनी गद्दी को खिसकते देख अपनी सारी आदर्शवदिता भूल गयी और दिल्ली की सड़कों पर चालीस हजार पुलिस तथा मिलटरी को तैनात कर महिलाओं का अपमान किया. महिलाओं ने भी उसे यह समझा दिया कि औरत वोट देकर उन्हें जिता सकती है, तो सड़कों पर प्रदर्शन कर सरकार के विरुद्ध नारे भी लगा सकती. सच में महिलाओं का सशक्तिकरण हो गया उनके अपने प्रयास से ही.
गर्व के क्षण
0 कलकत्ता में पैदा हुई शर्मिला मोना सिन्हा न्यूयोर्क के ‘नेशनल वुमेन्स हॉल आफ फेम’ में मानव सेवा के उद्देश्य से पदस्थापित की गई.. विश्व में महिलाओं के अधिकारों की बात उठाना उनके जीवन का मुख्य उदेश्य रहा है. यही उसके जीवन की वृत्ति भी रही है. उनका कहना था कि भारत में लड़की होकर जन्म लेना और उसमें भी दूसरी बेटी बनकर जन्म लेन एक अभिशाप होता है. वे खुद दूसरी बेटी रही. हालांकि उनके लालन पालन में कोई कमी नहीं रही. लेकिन उनका कहना है कि वह अपने माता पिता की आंखों में निराशा अवश्य देख सकती थीं. महिलाओं जीने के अधिकार को वे अपनी आवाज देती हैं.
0 एशियाड खेल कूदों में भारतीय लड़कियों की भागीदारी पुरुषों से अच्छी रही. तीरंदाजी, कुश्ती, शूटिंग, कबड्डी, हॉकी जैसे खेलों में स्वर्ण पदक लाकर देश का गौरव बढ़ाया. कुल एक्कीस गोल्डमेडल में से 11 गोल्डमेडल जीतकर महिलाओं ने अपनी विशिष्टता दिखाई.
0 2026 का शांति नोबल प्राइज भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रिका में रहने वाली नवी पिल्लई को मिला है. वे दक्षिण अफ्रिका में जज के पद पर रह चुकी थी. बाद में राष्ट्र संय की मानवाधिकार प्रमुख रही. यह अवार्ड उनको युद्ध अपराध और नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाने तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के प्रयास के लिए मिला.
0 2026 का साहित्य में नोबल एवार्ड कनाडाई लेखिका एनी कारसन को मिला. उन्हे यह एवार्ड उनकी साहित्यिक कृति ‘फार हर बोल्ड एंड इनवेंटिव आयेवर दैट’ के लिए मिला. उन्होंने इस किताब में साहित्य की शास्त्रीय परंपराओं के साथ मजाकिया अंदाज में एक संवाद स्थापित किया. इस नई विधा की प्रशंसा विश्वभर में हो रही है.

महिलाएं अपने दम शक्तिशाली हो गयी हैं
विगत दस बारह वर्षों से, जब से बीजेपी का शासन चल रहा है ‘महिला सशक्तिकरण’, ‘मातृ वंदन’ जैसे शब्द बहुत प्रचलन में आ गये हैं. उनके अनुसार महिलाएं पुरुषों से कमजोर हैं. महिलाओं के साथ हिंसा , अत्याचार, बलात्कार की घटनाएं उनके कमजोरी का ही परिणाम है. इसलिए महिलाओं को सशक्त करना सरकार अपना कर्तव्य…
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