राहुल गांधी द्वारा चलाए गए ‘छात्रों की गूंज’ एक महत्वपूर्ण अभियान है। इस कार्यक्रम में वे युवा पीढ़ी से संवाद कर उनकी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। इसी दौरान वे छात्राओं के बीच भी गए। इसमें  एक आदिवासी छात्रा ने हिम्मत कर एक ऐसी परिपाटी का जिक्र किया जो महिलाओं की निजता और गरिमा से जुड़ा है और अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ था।
आदिवासी छात्राओं ने महाराष्ट्र के आदिवासी आश्रमशाला एवं सरकारी गर्ल्स स्कूलों में होने वाले ‘प्रेगनेंसी नेगेटिव’ का मेडिकल प्रमाण पत्र देने का मुद्दा उठाया। राहुल गांधी ने ऐसे परीक्षण को उनकी गरिमा पर हमला एवं निजता का उल्लंघन बताया। तत्काल उन्होंने देवेंद्र फडणवीस को इसे बंद करने के संदर्भ में पत्र भी लिखा। इसी बीच सितंबर माह में घोटी और कलवण (नासिक )में पोला त्यौहार की छुट्टी के बाद अपने विद्यालयों में पुनःजाने पर सरकारी अस्पतालों में निगेटिव प्रमाण पत्र लेने के लिए लड़कियों को लंबी लाइन में लगना पड़ा। लड़कियों के हाथ में प्रेगनेंसी नेगेटिव का सर्टिफिकेट का वीडियो वायरल हुआ। इस शर्मनाक वीडियो के बाद लोगों का ध्यान  गया। इसे भी शिक्षा व्यवस्था में दोष मान कर एवं सच को सामने लाने के उद्देश्य से काकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके  ने नागपुर वर्धा के छात्रावासों में इसकी जानकारी लेने गए। उन्होंने भी इस  प्रमाण पत्र को बंद करने की मांग की।
महत्वपूर्ण बात यह है कि स्कूल के प्रधान अध्यापकों ने स्वीकार किया कि ऐसा कोई लिखित आदेश नहीं है बल्कि  मौखिक आदेश के नाम पर यह कार्रवाई की जा रही है। ऐसा दशकों से चल रहा है. पहली बार इसकी जानकारी तब हुई जब 2016 में फडणवीस सरकार ने सालुंके कमेटी बनाई। राज्य में 10 वर्षों के अंदर 1077 छात्राओं की मौतें होने की रिपोर्ट के बाद सरकार हरकत में आई और तब इस मौखिक आदेश का पता चला। जानकारी मिलते ही अगस्त 25 में महाराष्ट्र महिला आयोग की अध्यक्ष रुपाली चाकणकर ने अपने स्तर से भी जांच कराई और इसे सही पाए जाने पर माना कि यह शर्मनाक है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए।
जानकारी यह भी है  कि महाराष्ट्र के आदिवासी आश्रमशाला एवं सरकारी गर्ल्स हॉस्टलों में यह परीक्षण वर्षों से चल रहा है। 13 वर्ष से ऊपर की छात्राओं को अवकाश (पोला , दिवाली या दो-तीन महीने के लंबी छुट्टी ) से छात्रावास लौटने पर प्रेगनेंसी नेगेटिव का मेडिकल सर्टिफिकेट जमा करना पड़ता है। इसकी पूरी व्यवस्था छात्रावास द्वारा किया जाता है। वार्डन किट देती हैं, छात्रा अस्पताल जाती है जहां उसका यूरीन प्रेगनेंसी टेस्ट होता है और फिर वह छात्रावास में प्रवेश ले पाती है।
ऐसा नहीं कि सिर्फ महाराष्ट्र में इस तरह की परिपाटी है। अन्य राज्य में भी महिलाओं के अस्तित्व को यौन शुचिता से जोड़कर देखा जाता है। बाहर से आने वाली महिलाओं का प्रेगनेंसी- परीक्षण, छात्रावास में यौन उत्पीड़न, तो कभी छात्राओं का  मजबूरन गर्भधारण, कभी पर पुरुष संबंध के संदेह मात्र से महिलाओं का निष्कासन या प्रताड़ना –ऐसी घटनाएं हम देखते सुनते रहते हैं। दरअसल ऐसी निंदनीय परिपाटी उस पुरुषवादी सोच का परिणाम है जो महिलाओं को उपभोग का सामान मानता है।

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