सत्तर वर्ष पुराना अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य है अनैतिक तरीके से लडकियों को वेश्यावृत्ति में लाने से रोकना है. यानी, इसके व्यवसायीकरण को रोकना है. इसका कदापि यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता है कि इस अधिनियम का उद्येश्य वेश्यावृत्ति को ही बंद करना है. इसे अपराध की क्षेणी में भी नहीं रखा गया है. अधिनियम यह भी कहता है कि जो व्यक्ति मानव तस्करी के जरिये लडकियों को इस पेशे में लाता है, वह अपराधी है, न कि वे लडकियां. इस अधिनियम में इस तरह जबरदस्ती वेश्यावृत्ति में लाई गयी लडकियों को वेश्यालयों से छुड़ाकर पुर्नवास की व्यवस्था की भी बात कही गई है.
लेकिन इस अधिनियम की धारा 7 और 8 के अनुसार कोई महिला अपने इस पेशे के लिए किसी सार्वजनिक स्थान पर या दूसरे महत्वपूर्ण जगहों पर खड़े होकर अपने ग्राहकों को आकर्षित करने की कोशिश करती है, तो वह दंडनीय होगा क्योंकि इससे अश्लीलता फैलती है.
महिलाओं ने सबसे पहले जिस पेशे को अपनाया होगा वह वेश्यावृत्ति ही होगी. पितृसत्तात्मक समाज में महिलायें पुरुषों पर आश्रित होती हैं. किशोर अवस्था में पिता, यौवन में पति और बुढ़ापे में पुत्र ही उसका अवलंबन होता है. वह घर के अंदर रह कर घर के काम काज कर सकती है या बच्चे पैदा कर उन्हें पाल सकती है. यदि कभी किन्ही विपरीत परिस्थितियों में उसका अवलंबन छिना जाता है तो वह निराश्रय हो जाती है. उसके साथ केवल उसका शरीर होता है. उसे अन्य किसी सम्मानजनक पेशे के लायक बनने ही नहीं दिया जाता है. इस शरीर का उपयोग कर वह पुरुष को खुश कर सकती हैं या उसकी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति कर सकती है. अपने को जीवित रखने के लिए वह इसी का उपयोग करती है. इस तरह वह मजबूरी वश ही सही वेश्या बन जाती है. यह एक बदनाम पेशा माना जाता है. वेश्यावृत्ति अपनाई हुई महिलाओं का समाज में कोई सम्मान नहीं होता है.
यह एक खराब पेशा होते हुए भी सदियों से समाज में यह कायम है. समय के साथ इनके नामों में अंतर आया है. मगध साम्राज्य में यह नगरवधू कहलाती थी. किन्हीं अन्य राज्यों में गणिकाएं. ये राजदरबार में नृत्य तथा गायन से मनोरंजन करती थी. ब्राम्हणों ने भी अपने लिए ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि प्रत्येक ब्राह्मण परिवार को अपनी एक बेटी को मंदिर को दान करना पडता था. इसके बाद उस लडकी का अपने परिवार से कोई संबंध नहीं रह जाता था. वह भगवान की दासी यानी देवदासी कहलाती थी. मंदिर ही इनका निवासस्थान होता था. एक देवदासी की बेटी फिर देवदासी बन जाती थी. इनका काम भी मंदिरों में नृत्य और गायन करना होता था.
मुगल काल के आते ही इनक नाम हो जाता है बाई, जो बड़े-बड़े आलीशान कोठों में रहती थीं. सामंत, जमींदार इनके संरक्षक होते थे. अपने नृत्य और संगीत से वे उनका मनोरंजन करती थीं. यहां राजनीति के दांवपेंच भी खेले जाते थे. धनाड्य लोगों के घरों में शादी के उत्सव में ये नाचने गाने के लिए बुलाई जाती थीं. इस समय तक इस पेशे में लगी हुई स्त्रियां शास्त्रीय नृत्य तथा गायन में पारंगत होती थी. एक तरह से उन्होंने इन दोनों कलाओं को जीवित रखा. इनसे पहले नृत्य तथा गायन पर पुरुषों का ही अधिकार था.
आधुनिक युग के आते आते ये महिलाएं वैश्याये, बार गर्लस् या फिर काल गर्ल्स बन गयी. पुरुषों के मनोरंजन से ज्याद इनका काम पुरुषों की शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति मात्र रह गया. शास्त्रीय संगीत या नृत्य समाप्त हो गये और उसके स्थान पर सस्ते और अश्लील बंबइया फिल्मी गीतों ने ले लिया. यह पेशा जब अच्छा नहीं माना जाता है तो महिलाओं -को इस पेशे से बाहर निकाल कर उनका पुर्नवास क्यों नहीं किया जाता है?
विडंबना यह भी है कि कई सौ सालों से चले आ रहे इस पेशे को कानूनी संरक्षण तो मिला है, लेकिन यह अभी भी बदनाम है. इसे छुप कर रात के अंधेरों में चलाया जाता है. कोई वैश्या यदि अपने ग्राहकों को ढूढ़ने के लिए किसी सार्वजनिक स्थल पर खड़ी हो जाय तो यह समाज के लिए अश्लील और अभद्र व्यवहार होता है, ऐसा मानना है समाज का, पुलिस प्रशासन तथा कोर्ट का भी.

वेश्यावृत्ति अपराध की श्रेणी में नहीं!
सत्तर वर्ष पुराना अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य है अनैतिक तरीके से लडकियों को वेश्यावृत्ति में लाने से रोकना है. यानी, इसके व्यवसायीकरण को रोकना है. इसका कदापि यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता है कि इस अधिनियम का उद्येश्य…
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