मोदी जी को अचानक यह ज्ञान हुआ कि भारतीय महिलाओं को जल्दी से जल्दी उनका राजनीतिक अधिकार दे देना चाहिए. यह महिलाओं का संविधान प्रदत्त अधिकार है और करोड़ों महिलाओं की यही आकांक्षा भी है. उनका कहना है कि जबतक महिलाओं को पुरुषों के बराबर राजनीतिक अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक भारत की उन्नत्ति नहीं होगी.
इसके लिए उन्होंने अप्रैल के महीने को सर्वोत्तम माना है. क्योंकि पूरे देश में लोग हिन्दू नववर्ष का त्यौहार इस महीने में अलग-अलग दिनों में मनाते हैं. देश का वतावरण उल्लासपूर्ण और पवित्र होता है. साथ ही इसी महीने के ग्यारह तारीख को जोतिबा फुले का जन्म हुआ था और चैदह अप्रैल को डा अंबेडकर का जन्म हुआ था. इन दोनों महनुभावों का प्रयास रहा है कि भारत की महिलाएं शिक्षित हों . देश और समाज की उनत्ति में सहयोगी हो. इसलिए इसी महीने में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देकर उनको सशक्त करना सबसे उत्तम होगा.
अपने विचारों की पुष्टि करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय महिलाएं हमेशा देश की उन्नत्ति में आगे रही हैं. विज्ञान, कला, टेक्नोलॉजी, खेल, सेना आदि क्षेत्रों में महिलाएं आगे हैं. इसके लिए देश में ऐसा वातावरण बनाया गया है. महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य तथा दूसरी सुविधाओं को उपलब्ध करा कर उनको सशक्त बनाया गया. अब लैंगिक समानता में एक ही अड़चन है और वह है भारतीय महिलाओं को राजनीतिक अधिकार न होना. इस अधिकार को देकर उनकी योग्यता, प्रखरता तथा सटीक निर्णय लेने की क्षमता का भरपूर फायदा सरकारी निर्णयों में लिया जा सकता है.
इसके लिए उन्होंने सभी विपक्षी दलों के सांसदों का आह्वान किया है और कहा है कि 16 अप्रैल से 18 अप्रैल तक होने वाले संसद के विशेष सत्र में भाग लें. अपने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर महिला आरक्षण बिल की चर्चाओं में भाग लें और बहुमत से इसे कानून बनाने में सहयोग करें. उन्होंने विपक्षी सांसदों को पत्र लिखकर इस बिल के महत्व को समझाय और विशेष सत्र में भाग लेकर इसे बहुमत से पास करने की प्रार्थना की.
उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में सफलता पायी हुई विशिष्टि महिलाओं का एक सम्मेलन बुलाकर इस बिल के पक्ष में उनके मत की जानकारी भी ली. यहां ध्यान देने की बात यह है कि सरकार ने कुछ दिन पहले ही अपना यह विचार व्यक्त कर दिया था कि लोकसभा के सीटों में 50 फीसदी वृद्धि कर दी जायगी, यानि 543 वर्त्तमान सीटों को बढ़ा कर 816 सीटें कर दी जायेंगी और इनका अंतर  273 सीट जो कुल सीटों के एक तिहाई होते हैं, महिलाओं के लिए आरक्षित हो जायेंगें. 2011 में हुई जनगणना के आधार पर ही परिसीमन होगा और लोकसभा में सीटों की वृद्धि का आधार वही परिसीमन होगा.
यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि 2023 के सितंबर महीने में मानसून सत्र के दौरान बीजेपी सरकार आनन फानन में संसद में महिला आरक्षण बिल ले आयी. इसके लिए उन्होंने संविधान का 334 वां संशोधन किया और संविधान में यह दर्ज हो गया कि यह बिल कानून बनकर 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू होगा. उसके पहले 2025 में जनगणना होगी और उसी के आधार पर परिसीमन का काम होगा. परिसीमन के आधार पर लोकसभा के सीटों में वृद्धि की जायगी और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होंगी.
विपक्षी दलों के साथ महिलाओं के लिए भी यह बहस का विषय बन गया है. विपक्षी दलों के नेताओं ने साफ कर दिया था कि जब तक चारो राज्यों और एक केंद्रशासित राज्य में चुनाव नहीं हो जाते, वे संसद के विशेष सत्र में भाग नहीं ले सकते हैं. सभी चुनाव 29 अप्रैल को समाप्त हो जायेंगे तो उसके बाद किसी भी दिन विशेष सत्र बुलाया जा सकता है.
इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि जब 2023 में संविधान के 334 वें संशोधन के द्वारा महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की बात स्पष्ट रूप से लिखी जा चुकी है और उसमें यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि उसके पहले जनगणना और परिसीमन का काम भी होगा और वही लोकसभा में सीटों को बढाने का आधार बनेगा. फिर नये सिरे से महिला आरक्षण को लेकर यह तत्परता किसलिए ? अभी पास होने वाला बिल भी 2029 के लोकसभा चुनाव में ही लागू होगा.
कहा यह भी जा रहा है कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन होगा तो किस आधार पर पहले ही लोकसभा के सीटों को 816 कर दिया गया है? ठीक उतने ही सीटों को बढ़ाया गया है जो कुल सीटों का 33 फीसदी होगा. महिला आरक्षण का काम भी हो जायगा और पुरुषों के सीट भी सुरक्षित रहेंगे.
सरकार की इस तत्परता को पश्चिम बंगाल तथा तमिलनाडू के चुनावों से भी जोड़ा जा रहा है. इन दोनों जगहों की महिलाएं 15 हजार या नौ हजार प्रतिमाह के वादे से बीजेपी को वोट देने वाली नहीं हैं. वे लोग राजनीतिक रूप से सजग और शिक्षित है. उनको तो महिला आरक्षण जैसे कानून के द्वारा ही लुभाया जा सकता है.
सरकार पर इस बात का भी शक किया जा रहा है कि शायद वह 2025 के जुलाई में किये गये अपने वादे के अनुसार इस बार वह जाति आधारित जनगणना नहीं कराना चाहती है. इसीलिए महिला आरक्षण के बहाने से जनगणना को ही टाल देना चाह रही है.
विपक्षी दल महिला आरक्षण के पहले परिसीमन पर चर्चा चाहते हैं, क्यों कि भारत के सभी राज्य बराबर की जनसंख्या के नहीं है. सभी राज्य क्षेत्रफल के हिसाब से भी बराबर नहीं हैं. कोई राज्य बहुत छोटा हैं तो कोई राज्य बहुत बड़ा हैं. उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा राज्य है. यहां से लोकसमा में 80 सांसद चुनकर आते हैं तो झारखंड ऐसे राज्य से मात्र 14 सांसद लोकसभा में जाते हैं. इससे सभी राज्यों के परिसीमन के बाद उनका प्रतिनिधित्व अनुपातिक नहीं होगा. इसका लाभ बडे राज्यों को तथा शासन में जो राजनीतिक दल है उसको होगा. इसलिए इसका भी समाधान पहले होना चाहिए.
इन सब क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के बीच महिलाओं के मन में भी कई तरह के प्रश्न उठते हैं. उन्होंने 2023 में महिला आरक्षण बिल के पास होने पर उनके शर्तों और लागू होने के समय को लेकर अपनी क्षुब्धता प्रकट तो की थी लेकिन फिर यह सोचकर कि 2029 में उन्हें यह अधिकार मिल जायगा वे संतोष कर गयीं . लेकिन अब इस नये शगूफे से वे यहां तक सोचने लगी कि क्या सच में यह अधिकार महिलाओं को मिलेगा या फिर किसी बहाने से इसे टाल दिया जायगा. अभी के इस हो हल्ला से भले ही बीजेपी राज्यों के चुनाव में इसका फायदा उठा ले, बाद मैं चुप्पी लगा जाय. महिलाएं यह भी कह रही हैं कि मोदीजी को यदि महिलाओं की इतनी ही चिंता है तो वे महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दे दें.

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