अभी-अभी बेल्जियम की सरकार ने एक कानून बना कर जिस्मफरोशी को भी एक ‘पेशे’ के रूप में मान्यता देकर सेक्स वर्करों को स्वास्थ बीमा, सवैतनिक अवकाश, मातृत्व अवकाश जैसे अधिकार दिये हैं. यह सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन अंधेरा पक्ष यह है कि एक तरह से वेश्यावृत्ति को खत्म करने के दायित्व से समाज और सरकार को मुक्त कर देता है. यह उन करोड़ो करोड़ श्रमशील महिलाओं का भी अपमान है जो हाड़ तोड़ मेहनत कर जीवन बसर करती हैं.
दुनिया की कुल आबादी 850 करोड़ के करीब है, जिसमें लगभग 5 करोड़ की आबादी सेक्स वर्कर के रूप में काम करती हैं. गरीबी, भूख और तरह-तरह की मजबूरियों के बावजूद 400 से 500 करोड़ महिला आबादी जीवन यापन के लिए इस तरह का शाॅटकट रास्ता नहीं अपनाती. और इस धंघे में जो औरते लायी जाती हैं, उनमें से अधिकतर बहला फुसलाकर या जबरन ढ़केली जाती है.
किसी भी सभ्य समाज के लिए जिस्मफरोशी ‘पेशा’ नहीं होना चाहिए, हालांकि विरोधाभास यह कि वृहद समाज और नागरिकों का पारिवारिक जीवन स्वस्थ और गरिमामय बना रहे, उसके लिए नागर सभ्यता में हमेशा से जिस्मफरोशी को आवश्यक भी माना गया है, वरना ‘भले- अभिजात घर की स्त्रियों’ की पवित्रता और मासूमियत कैसे सुरक्षित रहेगी!
सेक्स वर्कर को एक मजदूर की तरह कानूनी अधिकार देने वाला पहला देश बेल्जियम बन गया है. इससे समाज और सरकारों को इस दायित्व से छुटकारा मिल गया है कि वे जिस्मफरोशी का समूल नाश करें. कुल महिला आबादी के एक फीसदी से भी कम महिलाओं को क्या समाज और सरकारें इतना आर्थिक आधार नहीं दे सकती कि वे इस तरह का घृणित पेशा अपनाये बगैर सम्मान से जीवन-यापन कर सकें?
यानि, यह कानून बन जाने के बाद ‘दलाल’ नियोक्ता हो जायेगा. वह महिलाओं को खुल्लम खुल्ला इस धंधे के लिए पंजीकृत करेगा. हो सकता है इस पेशे में शामिल होने के लिए विज्ञापन भी दे.
वैसे, करीबन दो सौ वर्ष पहले ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टों’ में कह चुके हैं कि पूजीवादी व्यवस्था में सब कुछ बिकाउ माल में बदल जायेगा. औरत का ‘जिस्म भी एक जिंस’ में.
कुछ लोग झट से कहेंगे कि क्या सेक्स वर्करों को भी मानवीय अधिकार नहीं मिलने चाहिए? जरूर मिलना चाहिए, लेकिन इस संकल्प के साथ यह अधिकार मिलनी चाहिए कि हमारा मूल लक्ष्य किसी भी रूप में स्त्री शरीर की तिजारत को खत्म करना होनी चाहिए. सेक्स व्यापार या जिस्मफरोशी को कैरियर/पेशे का दर्जा दे कर हम उस मूल भावना की हत्या करते हैं.
वैसे, प्रसिद्ध कथाकार मंटों का कहना था कि वेश्यायें पैदा नहीं होती, बनायी जाती हैं.
नोट: इस विषय पर कोई महिला लिखना चाहती हैं तो वे अपना आलेख जरूर भेजें. उसे हम अगले अंक में जारी करेंगे-संभवा इंजोर






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