प्यारी वर्जिनिया वुल्फ
उम्मीद करती हूं जहां भी होगी तुम्हारे पास अपना एक कमरा होगा। और उस कमरे में खिड़की भी होगी। खिड़की के बाहर बादल के गुच्छे तैरते होंगे। और बारिश तुम्हें भिंगो देती होगी।  मैं अपने कमरे में हूं और सोच रही हूं कि ये ख्याल कैसे आया होगा तुम्हारे मन में कि स्त्रियों के पास अपना कमरा हो।
जिस कमरे से तुमनें स्त्रियों के जीवन को देखा, उसके लहुलुहान सपने देखे, मुक्ति का स्वप्न देखा।  वर्जिनिया वुल्फ, तुमनें एक कमरे के जरिए ऐसी खिड़की खोल दी जिससे स्त्री के जीवन के हजारों हजार साल के शोषण के गिरह खुल पड़े।
मैं उस सड़क की ओर देख रही हूँ, जिस तरफ मेरे कमरे की  खिड़की  खुलती है। उस सड़क के दोनों ओर लैंप-पोस्टों पर फैस्टून लगे हैं… बाँसों पर झंडे लगाए गए हैं। जब हवा चलती है, फैस्टून गुब्बारे की तरह फूल जाते हैं, आकाश झंडों के बीच सिमट आता है…
शायद कोई बड़ा नेता पटना आया है। ये लोग जब भी आते हैं शहर बदसूरत हो जाता है। चारों तरह सिर्फ चेहरे ही चेहरे। मर्दों के चेहरे इन पोस्टरों को देख- देख कर थकान होने लगी है। मैं तुम्हें पढ़ते हुए सोच रही थी कि राजनीति, धर्म, समाज, लिंग, जाति इन सब के बीच कहां हैं औरतें। उनके पांव के नीचे जमीन कहां है। राजनीति में उनके लिए जगह कहां है। जिस धर्म की खातिर औरतें मर – खप जाती हैं उसी धर्म में उनका दोयम दर्जा है।  
शायद इसलिए तुमनें चाहा होगा कि स्त्रियों की दुनिया बदले। ये बदलाव एक कमरा कर सकता है, ये सोचना कितना सुखद है और हैरान करने वाला। मैं भी तुम्हारी बातों से इत्तेफाक रखती हूं कि कमरा सिर्फ आरामगाह नहीं है। कमरा एक स्त्री के लिए उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति का जरिया है। आप अपने एकांत में रच सकते हैं। किताब लिख सकते हैं। सोच सकते हैं। तुम्हें याद होगा तुमनें अपनी किताब  ‘अपना कमरा’ में इस बात का जिक्र करते हुए कहा  – ‘मैं आपसे सभी तरह की किताबें लिखने के लिए कहूंगी, चाहे वह विषय कितना भी छोटा या बड़ा क्यों न हो, किसी भी तरह से संकोच न करें। मैं उम्मीद करती हूं कि किसी भी तरह से आपके पास इतना पैसा होगा कि आप यात्रा कर सकें और आराम कर सकें, दुनिया के भविष्य या अतीत पर विचार कर सकें, किताबों के बारे में सपने देख सकें और सड़कों के कोनों में घूम सकें और विचारों की धारा को गहराई में डुबो सकें।’
तुमने कितनी सुंदर बात कही। देखो क्या ये संयोग है कि मेरे भीतर भी यात्रा करने की गहरी भूख है। मेरे पास पैसे नहीं है। अगर होते तो मैं यात्रा पर निकल जाती। पहाड़, नदी, समुद्र मुझे पुकारते हैं। यात्रा करते हुए मैं विचारों की धार में डूबती हूं और कागज और कलम मेरे साथ होता है। ये दुनिया बहुत सुंदर है । इसे जानना ही चाहिए। जीवन के विविध रंगों से परिचय यात्राओं के जरिए ही तो होता है।
वर्जिनिया वुल्फ, तुम्हें बुरा लगेगा जब ये पता चलेगा कि दुनिया अभी भी स्त्रियों के लिए बहुत बदली नहीं। अब भी वो अपनी मर्जी से घूम नहीं सकती है। उसके जीवन में कोई निजी स्पेस नहीं है। जिसे वो अपना कहे। तुमनें अपनी किताब ‘अपना कमरा’ के बहाने स्त्रियों के जीवन का सच लिखा। उनके पास न अपना पैसा है, ना अपना कमरा।
मैं खुद अपने बारे में सोचती हूं  कि मेरे जैसे लिखने वालों के पास  अगर दोनों चीज होती तो शायद मैं इससे बेहतर और ज्यादा लिख पाती। या अबतक  बहुत कुछ लिख चुकी होती। मेरे बचपन और जवानी का बड़ा हिस्सा संयुक्त परिवार में बीता। वहां कमरा मिलना स्वप्न था। जिसे जहां जगह मिलती वो वहीं पसर जाता। घर अक्सर लोगों से भरा रहता। मेहमान आते- जाते रहते। हम अपनी किताबों के साथ जगह बदलते रहते। जब थोड़े बड़े हुए तो एक कमरा मिला। उस कमरे में घर का सारा पुराना सामान रहता था। ये कमरा भी इसलिए मिला कि मेरी एक बहन हमारे घर पढ़ने के लिए आ गई। काका उसे पहुंचा गए। उन दिनों हमलोग राजेंद्र नगर में रहा करते थे। वो कमरा हमारी जिन्दगी का पहला अपना निजी स्पेस था। पहली बार अपना बिस्तर, पढ़ने के लिए टेबुल और एक टीन का बक्सा मिला जो हमारा था। चैकी पर हम दोनों सोते। हमारे कमरे में खिड़की थी। जहां से रात को तारे दिखते। नीले आसमान  पर चमकते सितारे मेरे ख्वाब को पंख लगा देते। ये खिड़की हमारी जिन्दगी का अहम हिस्सा था। इस खिड़की से कई खिड़कियां दिखती। कई जोड़ी आंखें। ये आंखें एक दूसरे को निहारती। घंटों टकटकी लगाए देखती । आंखों का किस्सा पुराने गीतों में खूब सुना था। दिलीप कुमार याद आते। ‘नैन लड़ जहिए तो मनवा में कसक होयबे करी’ लगता था ये गाना मेरे लिए ही लिखा गया है। तुमनें दिलीप साहब को नहीं देखा होगा । देखती तो मेरी तरह उनसे मुहब्बत कर बैठती। मैंने अपने कमरे में रेडियो पर उनकी फिल्मों की कहानियां सुनी।  अपनी खाबीदा आंखों से उन्हें देखती रही। ये जानना तुम्हारे लिए दिलचस्प होगा कि यूसुफ खान को दिलीप कुमार बनाया एक स्त्री नें।  देविका रानी ने दिलीप कुमार का नाम यूसुफ खान से बदला था। साल 1944 में देविका रानी ने बॉम्बे टॉकीज में काम करने वाले दिलीप कुमार को ‘ज्वार भाटा’ नाम की फिल्म में कास्ट किया था। और उनका नाम रखा दिलीप कुमार।  है ना ये दिलचस्प बात!
मर्दों की दुनिया संवारनें  में कितनी स्त्रियां होम हुई तुम जानती होगी। हमारे देश में ऐसे किस्से भरे पड़े हैं। महान पुरुषों नें उन स्त्रियों को कभी जगह नहीं दी जिन्होंने उन्हें बनाया। हमारे देश में बहुत सारी स्त्रियां अपने नाम से भी नहीं लिख पाती थी। उनका लेखन अक्सर गुमनामी के अंधेरे में डूब गया। मैं जानती हूं तुमने ये जानने के लिए कि, स्त्रियों को जगह क्यों नहीं मिली, इसकी गहरी खोज की है। तुमनें हजारों लोगों को पढ़ा।  प्राउस्ट, शेक्सपियर, एमिली ब्रोंटे, जेन ऑस्टेन, अफ्रा बेहन, चार्लोट ब्रोंटे, जॉर्ज इलियट, किपलिंग, कीट्स और कई अन्य ज्ञात और अज्ञात लेखकों की रचनाओं को पढ़ा। तुमनें  उनको पढ़ते हुए पाया कि उनके लेखन में महिलाओं का तिरस्कार है। तुम्हारी किताब ‘ए रूम ऑफ वन्स ओन’  दुनिया की औरतों के लिए आईना है। और इस पुरुष सत्ता पर गहरी चोट है। मैं सहमत हूं तुम्हारी बातों से। जिसमें तुमने कहा है कि स्त्रियों की आजादी के लिए जरूरी है कि उसके पास अपनी कमाई का जरिया हो और उसपर उसका अधिकार।
समय बहुत बदला है। पहले से बेहतर हुआ है। स्त्रियां  अब अपने पैरों पर खड़ी होना सीख रही है। पर पुरुष सत्ता बहुत ताकतवर है। इसलिए उसकी कमाई पर उसका हक हो, ये वो नहीं चाहता। स्त्रियों की आर्थिक आजादी तब तक नहीं होगी जबतक पुरुषों के नियंत्रण में वो है। पर ये सोचना कितना सुखद है कि आपके पैसों पर आपका अधिकार हो। तुम्हारी बात मुझे खूब याद है। तुम कहती थी ना कि – “रेजगारी को बटुए में सरकाते हुए और बीते दिनों की कटुता को याद करते हुए मैं सोच रही थी कि एक निश्चित आमदनी स्वभाव को कितना बदल देती है। दुनिया की कोई भी ताकत मुझसे मेरे पाँच सौ पौंड नहीं ले सकती। रोटी, कपड़ा और मकान मेरे हैं। इसलिए न केवल मेरी मेहनत-मशक्कत का अंत हो गया है, बल्कि घृणा और कटुता का भी। मुझे किसी पुरुष से घृणा करने की जरूरत नहीं है, वह मुझे चोट नहीं पहुंचा सकता। मुझे किसी पुरुष की खुशामद करने की जरूरत नहीं है या उसके पास मुझे देने को कुछ भी नहीं है। इस तरह अबूझे ही, मानवजाति के दूसरे आधे हिस्से के प्रति मेरा रुख बदलने लगा।’
सही कहा तुमने वर्जिनिया,  जिस दिन हमारा अपने पैसों पर इख्तियार होगा, दुनिया हमारी मुट्ठी में होगी। हमारे पास अपनी एक छत हो। और इस बात की चिंता नहीं हो कि कल पैसे के बिना हमसे हमारा घर छीन लिया जायेगा या किसी के अधीन रहना होगा। हमें वो सब करने का हक होगा जो हम करना चाहते हैं।
क्रमशः

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