मैं जानती हूं। तुम्हारे बारे में खूब पढ़ा है। और आजादी के ख्वाब देखे हैं। तुम लंदन की सड़कों पर घूमती थीं, नदी के किनारे बैठती थीं, ब्रिटिश संग्रहालय में किताबों से भरी अलमारियों को ध्यान से देखती थीं, लंच पर जाती थीं और साहित्य के मौजूदा हालात पर विचार करती थीं। लंदन में एक छोटी सी जगह में काम करते हुए, जहाँ महिलाओं को कॉलेजों में टर्फ पथों पर चलने की भी अनुमति नहीं थी (केवल पुरुष और छात्र ही ऐसा कर सकते थे) वर्जिनिया वुल्फ़ तुमनें इस सब के खिलाफ लिखा। तुम्हारी तरह मुझे भी घूमना, किताबें पढ़ना खूब पसंद है। अक्सर सड़क पर चलते हुए मैं सोचती रहती हूं कि कितना अच्छा होता अगर दुनिया रहमदिल होती। आदमी और औरत में दोस्ती, प्रेम और समानता का भाव होता।
मैं सोच रही हूं और सड़कों पर आवारा घूम रही हूं। फुटपाथ पर पत्तों का शोर है। यह शोर मैंने पिछली रात को भी सुना था। पिछली रात हमारे शहर में तेज हवा चली थी। हल्की बारिश भी हुई। गर्म और दहकती ज़मीन को थोड़ी राहत मिली। मुझे यह सोचना अच्छा लगता है कि हम दोनों गहरे दोस्त हैं। हालंकि तुम मुझे से कुछ सदी पहले पैदा हुई। तुमनें दुनिया को नया फलसफा दिया। तुमनें जो कहा आज उसके नक्श बन गए हैं। तुम्हारे निशान हर जगह मौजूद हैं, वर्जिनिया वुल्फ़। हम अलग अलग शहर और देश में जन्में। पर विचार की जो धारा तुमसे निकली उसकी जड़ें दुनिया में फैल गई। तुम्हारी कब्र को छूकर ये हवा मुझ तक पहुंची है। हवा चलती है, तो उनका शोर तुम्हारे और मेरे दिल के दरवाजों को एक संग खटखटाता है। मैं अदब की दुनिया तक जाती हूं तुम्हारा हाथ थामें। तुम कहती हो – “साहित्य सबके लिए खुला है। भले ही तुम कारिंदे हो, मैं तुम्हें यह नहीं करने दूंगी कि तुम मुझे घास पर से हटा दो। चाहो तो अपने पुस्तकालयों में ताले डाल दो; लेकिन ऐसा कोई दरवाज़ा, कोई ताला, कोई सिटकनी नहीं है जिससे तुम मेरे मन की आजादी पर लगा सको।”
हम स्त्रियां ताले की संस्कृति के खिलाफ हैं। दुनिया का कोई ताला हमारी जुबां पर नहीं लग सकता। फैज याद हैं तुम्हें जिन्होंने कहा – मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है,
कि ख़ून-ए-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ मैंने
ज़बाँ पे मोहर लगी है तो क्या कि रख दी है
हर एक हल्क़ा-ए-ज़ंजीर में ज़बाँ मैंने
प्यारी वर्जिनिया,
रात के अभी 12 बजे हैं और मैं तुम्हारे बारे में ही सोच रही हूं। जाने क्यों लगा कि तुम मेरे पास हो। मैंने घूमकर देखा बिस्तर खाली है। बाहर भी गहरा सन्नाटा है। मैं बाल्कनी में आ गई। आसमान पर बादल के कुछ टुकड़े हैं। उसकी नीली तहें बहुत घनी हो चली हैं। मेरे घर के नीचे लगे आम के दरख़्त के पत्तों की सरसराहट हवा के संग कभी तेज़, कभी धीमी होकर बह रही है। मैंने तुम्हें शिद्दत से महसूस किया। तुम्हारे बारे में सोचते हुए जाने कब नींद आ गई।
मैं गहरी नींद में थी मुझे लगा कोई भारी पत्थर मेरे बदन पर आ पड़ा है। और मैं जरा भी हिल नहीं नहीं पा रहीं हूं। पत्थर के बोझ से मेरा शरीर नीचे की तरफ लुढ़क रहा है। सामने नदी है । मैं अब डूबने वाली हूं बस डूब रही हूं। घबराकर मेरी आंखें खुल गई। मेरा पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ है। ओह मैं जिंदा हूं। ये क्या मेरा हलक सूख रहा है। आंखें आंसुओं से भरी है। शायद कोई बुरा सपना था। या ये सपना तुम्हारे गहरे दुख के बिंब थे। या फिर मेरे दिमाग में तुम्हारी मृत्यु का दृश्य है। ओह ये सब कुछ बहुत डरावना है वर्जिनिया। तुम्हें इस तरह नहीं जाना था। तुम तो हम सब के जीवन की साहस थी। हर सदी की स्त्री नें तुम्हारे विचारों के साथ अपनी जिन्दगी के लिए संघर्ष किया। हमारी राह तुमसे होकर गुजरती है। फिर ऐसा क्या हुआ कि तुमनें इस दुनिया को विदा कहा। खुद अपने कपड़ों में पत्थर लपेट नदी में समा गई। वो अंतिम खत जो तुमनें अपने प्रिय लियोनार्ड वुल्फ को लिखा, उसे मैं बार – बार पढ़ रही हूं। खत पढ़ते हुए रो रही हूं। प्यारी दोस्त तुम्हें विदा करने का वक्त नहीं था ये। लियोनार्ड वुल्फ की आंखों में आसूं के कतरे जैसे अब भी ठहरे हुए हैं। मैं अतीत को देख पा रही हूं। खत पढ़ रही हूं और मेरी रगों में खून की धार बह रही है।
जारी

वजीर्निया वुल्फ के नाम खत- 2
मैं जानती हूं। तुम्हारे बारे में खूब पढ़ा है। और आजादी के ख्वाब देखे हैं। तुम लंदन की सड़कों पर घूमती थीं, नदी के किनारे बैठती थीं, ब्रिटिश संग्रहालय में किताबों से भरी अलमारियों को ध्यान से देखती थीं, लंच पर जाती थीं और साहित्य के मौजूदा हालात पर विचार करती थीं। लंदन में एक…
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