अभी देश लोकतंत्र के महापर्व, यानी चुनाव से गुजर रहा है भारतीय मतदाता नेताओं के वादों, आश्वासनों के बीच से एक बार फिर कुछ बेहतर तलाश कर अपनी उम्मीदों को जिंदा रखने की जद्दोजहद में है. गंभीर मुद्दे पीछे छूट चुके हैं. जातीय, धार्मिक व क्षेत्रीय भावनाएं उभारने की कोशिश की जा रही है. अपनी उपलब्धियां बताने के बजाय दूसरों की गलतियां गिनाने पर ज्यादा जोर है. तरह तरह के नये पुराने गठबंधनों, दलबदल के इस अनोखे दौर में कैसा जोड़ तोड़ सामने आयेगा और कैसी सरकार बनेगी, यह फिलहाल अनुमान लगाना भी कठिन है. मगर इस पूरी गहमागहमी में महिलाओं के मुद्दे पूरी तरह गौण हो गये हैं.
विधायिका में महिलाओं के लिए आरक्षण संबंधी विधेयक को सहमति देने वाले दलों ने पर्याप्त संख्या में महिलाओं को टिकट न देकर यह साबित कर दिया है कि इस मुद्दे के प्रति उनकी प्रतिबद्धता नकली है.
दलित व पिछड़ी जातियों की महिलाओं के हितों की वकालत करने वाले दलों ने भी साफ कर दिया है कि वे कितना भी दलित-पिछड़ा वर्ग की स्त्रियों की हिमायत करें, वे खुद से कभी उन्हें राजनीति में आगे लाने वाले नहीं हैं. अभी तक जिन सीटों के लिए नामांकन हो चुका है, उन 355 सीटों के लिए कांग्रेस ने 35 और भाजपा ने 44 महिलाओं को टिकट दिया है. जाहिर है, राजनीति में स्त्रियों की भागीदारी कम होते जाने की चिंता किसी को नहीं है.
ध्यान रहे कि भारतीय महिलाओं ने बहुत पहले मताधिकार पा लिया था. 1920 में ही मद्रास और मुंबई विधान परिषद ने इसे पारित किया और 1926 में मद्रास विधान परिषद के लिए कमला देवी चट्टोपाध्याय और हेमंत एंजेला ने चुनाव भी लड़ा. 1929 तक देश की सभी प्रांतीय परिषदों में महिलाओं को मताधिकार मिल गया और आजादी के बाद तो महिलाओं को संविधान में बराबर के अधिकार मिले ही. मगर इसके बावजूद संसद में स्त्रियों की उपस्थिति बहुत कम रही (औसतन 6-9 फीसदी). विधान सभाओं में यह प्रतिशत और भी कम (3-6 फीसदी) है. आज विश्व स्तर पर निर्णय निर्धारण की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लगातार प्रयास हो रहे हैं. इसलिए कि अधिकतर देशों में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी आबादी के हिसाब से बहुत कम है.
आज भी (2008 तक के आंकड़ों के मुताबिक) विश्व की संसदों में महिलाएं सिर्फ 18.4 प्रतिशत हैं. वैसे भारत के राजनीतिक परिदृश्य में तो कांग्रेस की सोनिया गांधी, बसपा की मायावती, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और अन्नाद्रमुक की जयललिता न सिर्फ ताकतवर नेता हैं, बल्कि अपनी अपनी पार्टी की सर्वेसर्वा भी हैं. वहीं माकपा में सुहासनी अली, वृंदा करात और भाजपा की सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे की अपनी अलग पहचान है. यह भी सच है कि पुरुष सांसदों की अपेक्षा महिला सांसदों ने जेंडर आधारित हिंसा, महिला और बाल व्यापार, समान मजदूरी, कामकाजी स्त्रियों की सुविधाओं के मुद्दे ज्यादा उठाये हैं, फिर भी औरतों को राजनीतिक अधिकार मिले, इसके लिए अब तक के प्रयास नाकाफी रहे हैं. 12 वर्षों से संसद में महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा चर्चा में है और जाहिर है कि बिना महिलाओं की आक्रामक रणनीति के यह पारित नहीं होगा.
( संभवा इंजोर निकालने वाली कनक का दो मई को पुण्य तिथि है. उनको याद करते हुए हम इस अंक में उनका यह महत्वपूर्ण लेख प्रसतुत कर रहे हैं जो संभवा इंजोर, मई 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ था.)

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