सीता का चरित्र
व्यक्तित्व
व्याप्त है
हम सारी स्त्रियॉं पर
कल्पना, समाज की
मान्यता, परंपराओं की,
कि सीता सदृश्य बने हम,
प्रतिरूप,
प्रतिछाया,
तभी तो खींच रहें हैं
अनगिनत
अदृश्य
लक्षमन रेखाएँ
जिन्हें लांघना
ऐसा अपराध
ऐसा कुकृत्य
जिसकी सजा
इहलोक
परलोक तक व्याप्त है,
इस सोच परिकल्पना से परे
कि राम सदृश्य कितने धनुर्धारी हैं यहाँ।

सीता
सीता का चरित्रव्यक्तित्वव्याप्त हैहम सारी स्त्रियॉं परकल्पना, समाज कीमान्यता, परंपराओं की,कि सीता सदृश्य बने हम,प्रतिरूप,प्रतिछाया,तभी तो खींच रहें हैंअनगिनतअदृश्यलक्षमन रेखाएँजिन्हें लांघनाऐसा अपराधऐसा कुकृत्यजिसकी सजा इहलोकपरलोक तक व्याप्त है,इस सोच परिकल्पना से परेकि राम सदृश्य कितने धनुर्धारी हैं यहाँ।
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One response to “सीता”
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बहुत अच्छी रचना।





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