जिस दिन उसने सवाल पढ़े
स्त्री ने पहला विद्रोह तब किया
जब उसने झाडू छोड़ दिया
पुस्तक हाथ में ली
धूल अभी भी उड रही थी कमरे में
पर पहली बार
उसकी आंखों में अक्षर चमके
बरसों से झुकी पीठ ने
धीरे-धीरे सीधा होना सीखा
जैसे रीढ़ को याद आया हो
कि वह सिर्फ बोझ ढोने के लिए नहीं बनी
रसोई की आंच पर दूध उबलता रहा
प्रश्नों का
किसने तय किया
कि हाथ सिर्फ साफ करेंगे घर मन नहीं खोलेगा दनिया?
किसने लिखा कि उसका नाम हाजिरी में नहीं
बस राशन की सूची में होगा ?
पन्ना पलटा
और सदियों की चुप्पी
हल्की-सी आवाज में टूट गई
उस दिन कोई नारा नहीं लगा
कोई दरवाजा नहीं टूटा
बस एक स्त्री ने पढ़ना शुरू किया
और इतिहास
धीरे-धीरे बदलने लगा
दोआबा से साभार






प्रातिक्रिया दे