बलात्कार महिला उत्पीड़न का चरम रूप और मनुवादी सामाजिक व्यवस्था में बद्धमूल है. मनुवाद से प्रभावित भौगोलिक सीमा में बलात्कार की घटनाएं अधिक होती हैं. दिल्ली बलात्कार की राजधानी जरूर है, लेकिन महिला उत्पीड़न और बलात्कार के मामले में हिंदी पट्टी के दो राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार अव्वल है. पिछले कुछ वर्षों से बिहार में एनडीए का ही शासन था. एनडीए घटक का प्रमुख दल भाजपा का निरंतर प्रभाव बढ़ता गया और आखिरकार नीतीश को नेपथ्य में ढ़केल वहां भाजपा का शासन हो गया और एकबारगी स्त्री के साथ छेड़ छाड़ और बलात्कार की घटनाओं में गजब का इजाफा हुआ है.

जो पहली बात खटकती है कि हमेशा की तरह मीडिया में चर्चित हो जाने के बाद हमारी चिंता, कानून व्यवस्था की गिरती स्थिति पर स्यापा और सत्ता को कोसने की वही रूटीन प्रक्रिया. साथ ही अपराधियों को कठोर सजा देने की मांग. बस यह बात हमारी चिंता से ओझल रहती है कि यह बर्बर समाज, सेक्स कुंठाओं से भरा समाज हमने खुद बनाया है. हमने वर्तमान सत्ताधारियों को झोली भर-भर वोट देकर सत्ता पर बिठाया है. उस राजनीतिक दल और उनके समर्थकों को जो मनुवाद के पोषक हैं और मनुवाद का तो केंद्रीय तत्व ही यह है कि औरत एक जिंस से ज्यादा, बच्चा पैदा करने की मशीन से ज्यादा कुछ भी नहीं.

चिंतनीय यह भी है कि सामान्यतः माना जाता है कि सामंती समाज और सवर्ण जातियां समाज पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए जमुई जैसा वहशियाना हरकत करती हैं. लेकिन धीरे धीरे मनुवाद का जहर निम्न जातियों में भी उतरता जा रहा है. खास कर उन पिछड़े- दलित तबके में जो धनाड्य बन रहे हैं. आर्थिक संपन्नता आते ही पिछड़ी दलित आबादी का वह हिस्सा उसी तरह का आचरण करने लगता है जैसे सवर्ण और धनकुबेर करते हैं. बिहार में हुई हाल की अधिकतर घटनाऔं में महिलाओं के साथ बलात्कार करने वाले, उनके साथ सड़कों पर वहिशियाना हरकत करने वाले अभियुक्त पिछड़ा और ओबीसी संवर्ग से आते हैं.

और तो जो कुछ है, यौन कुंठा है. सबसे अधिक शारीरिक कमजोरी दूर करने वाले नीम हकीम और उनके विज्ञापन आपको हिंदी पट्टी में ही दिखेंगे. कभी ट्रेन से सफर करें तो झारखंड की सीमा पार करते ही रेलवे लाईन के दोनों तरफ की दीवारांे पर इसी तरह के विज्ञापन मिलेंगे जो उत्तर प्रदेश की सीमा तक चले जाते हैं. वही यौन कुंठा इस तरह के बर्बर आचरण में प्रगट होती है. जो प्रेम नहीं कर सकते, वे ही बलात्कार करते हैं.

इस समाज को बदलना आसान नहीं. जब स्त्री पाप का मूल है, वह पुरुष का सारा सत्व छीन लेती है, स्त्री-पुरुष के बीच आग और फूस का रिश्ता है आदि भावनाओं का अंत नहीं होता, स्त्री पुरुष के बीच सहज रिश्ते नहीं बनते, तब तक लोगों की यौन कुंठाएं इसी तरह वहशीयाने तरीक से व्यक्त होती रहेंगी. और यह एक लंबा सामूहिक कर्म है, लेकिन तत्काल देश में विधि का शासन स्थापित कर हम इसे रोकने का प्रयास कर सकते हैं. ़त्रासद यह कि जिनके हाथ में सत्ता पहुंच गयी है वे लंपट और मवाली किस्म के लोग हैं. उन्हें बिहार के हाल के दिनों में होनी वाली घटनाओं पर रत्ती भर शर्म नहीं. और इसके लिए जिम्मेदार वे लोग हैं जिन्होंने इस सत्ता को चुना है.

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