शहर में ‘करुणा’ नाम तेल के ब्रांड की बहुत चर्चा हो रही थी, तो एक पत्रकार होने के नाते मेरी रुचि जागी कि इस तेल की बढ़ती लोकप्रियता का कारण जाने के लिए इसके निर्माता से मिल कर एक साक्षात्कार लिया जाए। कई बार झूठे प्रचार से भी अनेक स्तरहीन चीजें कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय हो जाती हैं।
रविवार का दिन था। सोचा, आज इन लोगों की भी छुट्टी होगी तो ये फुरसत में होंगे! और चल पड़ी। एक दिन पहले ही मैंने अपने एक दोस्त से इनका पता लिया था। घर पहुँचने पर देखा कि घर कुछ खास नहीं है, छोटा-सा एकतल्ला मकान है। साथ लगी थोड़ी-सी जमीन पर पपीता, आम के पेड़ के साथ ही कई तरह के साग और धनिया पत्तों की झाड़ियां भी थीं। कॉल बेल ढूँढ कर दबाया ही था कि एक मध्य उम्र की, लगभग 30-35 के बीच की सूती साड़ी पहनी हुई महिला ने दरवाजा खोला। मैंने अपना नाम और आने का मकसद बताया, उन्होंने एक  हल्की मुस्कुराहट के साथ अंदर आने का इशारा किया। छोटा ही सही, करीने से सजा, साफ सुथरा बैठक- एक पुराने सोफ़े और कुछ कुर्सियां के साथ आगंतुक के आने के इंतजार में मिला। उसने बैठने का इशारा किया और खुद भी एक किनारे के सोफ़े पर बैठ गई। मैंने घर के मालिक से मिलने की इच्छा जताई, ताकि अपना काम कर सकूँ। उन्होंने कहा- ‘यहाँ मैं अपने दो छोटे बच्चों के साथ अकेले रहती हूँ, कहिए आपको क्या जानना है?’
मैंने अपने को स्पष्ट करते हुए कहा, ‘यह जो करुणा ब्रांड तेल है, उसके संदर्भ में बात करने आई हूँ, तो उनसे बात तो करनी ही होगी न!’
वो मुस्कराई, और बगैर अपने चेहरे पर कोई भाव लाये, गंभीरता से कहा- ‘मैं ही इस करुणा तेल के कारोबार की मालकिन हूँ। पहले मेरे पति यह कारोबार किया करते थे, लेकिन पाँच वर्ष पूर्व उनके गुजर जाने के बाद से मैं ही यह कारोबार देख रही हूँ।‘
मैं हतप्रभ, साथ ही शर्मिंदा भी… अपने और दूसरों को देखने का दोहरा मापदंड….मन ने कहा, खुद तो चली पत्रकार बनने और दूसरों के बारे में अधूरी सोच। हम यह मान कर चलते हैं कि घर के बाहर के कोई स्त्री कोई कारोबार नहीं कर रही होगी। हम सोच ही नहीं पाते कि कोई घरेलू महिला भी कारोबार करने की सलाहियत रखती होगी। साथ ही उनके पति के बारे में जान कर अफसोस प्रकट किया। असल में अफसोस तो अपनी सोच पर हो रहा था, कि बगैर कोई जानकारी इकट्ठा किये, मुंह उठाये चली आई। कारोबार के मालिक के बारे में तो कुछ जान ही लेना चाहिए था।
मैं असमंजस में थी, तभी उन्होंने बड़ी ही सहजता से कहा, घर के किसी भी व्यक्ति का असमय जाना वैसे तो दुख दाई होता ही है, और फिर पति का जाना, विधवा बन जाना तो और भी मारक है, लेकिन मेरे पति पीते बहुत ज्यादा थे। कितना भी मना करो, किसी की सुनते नहीं थे, खुद का स्वास्थ्य तो खराब किया ही, परिवार की हालत को भी खराब कर दिया, बच्चों का भविष्य खराब करने की कोशिश की, और हम सब को बीच भँवर में छोड़ कर चले गए।‘
मुझे उनका इस तरह खुल कर बोलना अच्छा लगा। मैंने उनके चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश की, कहीं कोई दुख अफसोस दिखाई नहीं दिया, फिर चेहरे को पढ़ने की कोशिश में थोड़ी ताक झाँक की, शायद आँसू की कोई बूंद दिखाई दे जाए, लेकिन वहाँ मैदान एक दम साफ था….
मैं हतप्रभ थी, सामने बैठी करुणा की तटस्थता से, दुख विहीन कहानी से,
मैंने जो भी सवाल सोच कर रखे थे, गडमड हो गए, फिर खुद को संभाला कि जिस काम के लिए इस जलती धूप में आई हूँ उसे तो पूरा करूँ।    
कई आधुनिक मशीनों के साथ उनका कोल्ड प्रेस्ड ऑयल बनाने का कारख़ाना था। इसकी जानकारी तो लेनी ही थी। मुझे सुनाई दिया मैं पूछ रही थी, ‘आपने अपना यह कारोबार कब शुरू किया और कैसे…?’
करुणा ने बड़े ही सधे शब्दों में कहा, जैसे साक्षात्कार देने की अभ्यस्त हो-  ‘पति के देहांत के बाद परिवार के सभी लोग आए और अपनी उपस्थिति दिखा कर, सहानुभूति दिखा कर, सांत्वना देकर श्राद्ध कर्म के बाद वापस लौट गए। उनकी सांत्वना या सहानुभूति से मेरा घर नहीं चलने वाला था, मेरे बच्चों का, मेरा पेट नहीं भरने वाला था। उस समय मैं बहुत परेशान हुई, बहुत ही दुखी, चारो ओर मुझे अंधेरा ही अंधेरा दिखता था। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती थी। मेरे पति के जाने के कुछ दिन बाद, हमारे यहाँ काम करने वाले कुछ मजदूर मुझसे घर पर मिलने आए और उन्होंने मुझे फैक्ट्री आने का अनुरोध किया। कहा कि कल भी तो वही लोग फैक्ट्री का काम करते थे, आगे भी वो फैक्ट्री में काम करना चाहते है, फैक्ट्री को शुरू करना चाहते है। उन लोगों ने मुझे समझाया कि इससे आपका घर भी चलेगा और हमारे बच्चे भी पल जाएंगे। मैं कभी घर से बाहर निकली नहीं थी, जिंदगी में कोई निर्णय लिया नहीं, अचानक से कैसे कुछ बोलूँ या करूँ, लोग क्या कहेंगे यह बात भी जेहन में थी। मैंने उन्हें उस समय कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन उस रात मैं सो नहीं पाई, सोचती ही रह गई, क्या  करूँ, क्या न करूँ? फिर दूसरे दिन मैंने पड़ोस की भाभी को सारी बातें बताई। उन्होंने मुझे समझाया कि आपके फैक्ट्री के मजदूर ठीक कह रहे हैं, आप कब तक ऐसे ही घर में बैठ कर मातम मनाती रहेंगी, जाइए और फैक्ट्री का काम शुरू कीजिये, आपके घर में भी कुछ पैसे आएंगे, घर की स्थिति सुधरेगी और मजदूरों की बेरोजगारी भी खत्म होगी। इस तरह मेरी फैक्ट्री चल पड़ी और आज आप मेरे सामने है कुछ सवाल के साथ, मेरे कुछ जवाब के लिए।“  
मुझे उनसे मिल कर बहुत अच्छा लगा, लेकिन खुद पर शर्म आई कि इतनी देर हो गई, उनका नाम भी नहीं पूछा।
पूछा- आपका नाम क्या है, वह हंस पड़ी, कहा- करुणा।
‘ये तो आपके ब्रांड का नाम है न?’
‘’हाँ, यह मेरे ब्रांड का नाम है, लेकिन यह मेरा भी नाम है। मेरे पति जब इस फैक्ट्री को चलाते थे, तब इसका नाम ‘अभिलाष’ था, जो मेरे पति का नाम था, मैंने जब इसे शुरू किया तो अपना नाम दे दिया।“
अब मेरा ध्यान इस बात पर गया कि हमारी बात के बीच कई बार प्रोडक्ट के नाम आए और जब भी नाम आता था, वे कुछ विशेष जोर  देकर ‘करुणा’ कहती थीं, मुझे थोड़ा अजीब भी लग रहा था। वह ‘करुणा’ नाम कुछ इस कदर उच्चरित करती थी, मानो मुझे याद करा कर ही छोड़ेगी, जैसे मेरे जेहन में मेरे दिमाग में वह नाम छप जाना चाहिए। मुझे उस समय लग रहा था, यह उनका अपने प्रोडक्ट को प्रचारित करने, उसके विज्ञापन का कोई तरीका होगा, अभी जाना कि यह उनका नाम है।
मैंने हंस कर कहा, ‘मुझे आपका और आपके प्रोडक्ट का नाम हमेशा याद रहेगा, क्योंकि यह खूबसूरत भी है और इसका अर्थ भी बहुत अच्छा है।”
मैंने देखा वे एक छोटी बच्ची की तरह हँसते हुए बोल रहीं है, ‘वही तो, पता है, मेरे पिता जी ने बड़े ही नाज से, बड़े ही प्यार से मेरा यह नाम रखा था, वे कहते थे, मेरी बेटी का नाम केवल सुंदर ही नहीं है, कई गहरे अर्थ लिये हुए है। लेकिन मेरी शादी क्या हुई कोई इसे पुकारता ही नहीं था, कोई मेरे बच्चों की माँ के नाम से, तो कोई मेरे पति की बहुरिया के नाम से मुझे पुकारते थे…मैं कहीं खो गई थी… मुझे मेरा नाम बहुत पसंद था, मैं उसे बराबर सुनना चाहती थी, लेकिन लोग हैं कि किसी न किसी से जोड़ देते थे और मेरा नाम खो जाता था” तब मैंने अपने व्यवसाय का नाम ही अपने नाम पर रख दिया… अब तो लोगों को मेरा नाम लेना ही पड़ेगा।“
मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और कई अच्छी सीख लेकर निकल पड़ी थी।

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