हमारे देश में एक ओर तो महिलाओं को दुर्गा, काली, सरस्वती कहकर पूजा जाता है, उसका मान बढ़ाया जाता है, दूसरी ओर समाज में उसे जलील किया जाता है, उसके सम्मान की धज्जियां उड़ाई जाती है. आमजन की बात तो छोड़ दीजिए हमारे जन प्रतिनिधि भी इसमें पीछे नहीं. वे संस्कृति की दुहाई देते हैं, पर व्यवहार में औरतों को भोग और मजाक की वस्तु समझते हैं. मौका मिलते ही उनके अंदर का यह घृणित और पुरुषवादी सोच प्रकट होने लगता है.
पिछले दिनों यह विकृति कानपुर एवं उत्तराखंड में देखने को मिली. ।2 जनवरी को कानपुर में आशा वर्कर अपने मानदेय बढ़ाने एवं सुविधाओं को लेकर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को ज्ञापन देने पहुंची थीं. उनकी समस्याओं को सुनने समझने के बजाय उप मुख्यमंत्री ने चुटकी लेते हुए कहा – 2000 में तुम्हारा घर नहीं चलता? क्या पति तुम पर निर्भर है, कुछ कमाते नहीं?
इसी प्रकार उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री (महिला सशक्तिकरण और बाल विकास) रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू ने अल्मोड़ा के एक कार्यक्रम के दौरान कह दिया कि बिहार में 20, 25 हजार में लड़कियां मिल जाती हंै. आगे उन्होंने यह भी कहा कि उनसे शादी कराया जा सकता है. यह उनके गंदी सोच और घटिया विचार की अभिव्यक्ति है. दोनों वक्तव्य से पूरा महिला समाज अपमानित हुआ है. बिहार तो अपमानित हुआ ही.
दरअसल कानपुर में आशा वर्कर्स को 2 घंटे का भुगतान किया जाता है, जबकि 8 से 10 घंटे काम करवाए जाते हैं. वह अपना मानदेय बढ़ाने, नियमित भुगतान करने, इंसेंटिव के बदले निश्चित मानदेय देने एवं अन्य कर्मचारी सुविधाएं मुहैया कराने की मांग करते हुए अपना ज्ञापन देने उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से मिलने गई थी, जहां उन्हें अपमानजनक बातें सुनने को मिली.
उनके बयान पर नाराजगी व्यक्त करते हुए आशा वर्कर की यूनियन मांग करती हैं कि मंत्री माफी मांगे. उन्होंने 5 जनवरी से काली पट्टी बांधकर विरोध प्रकट करने का निर्णय लिया है.
ज्ञात हो कि आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन एनएचएम के तहत एक मानदेय आधारित महिला स्वयं सेविका होती है. उन्हें निश्चित वेतन के बजाय कार्यों के आधार पर प्रोत्साहन राशि मिलती है. वे आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर मातृत्व, शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, परिवार नियोजन एवं अन्य सरकारी योजनाओं की जानकारी ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में घर-घर तक पहुंचाने का काम करती हंै. इसके बदले आशा वर्कर को राज्य अपना मानदेय तय करती है. बिहार सरकार 3000 प्रतिमाह देती है, तो केंद्र सरकार ने भी इस राशि को बढ़ाकर 3500 हजार देने की घोषणा की है. लेकिन उत्तरप्रदेश में अभी भी मात्र 2000 ही मानदेय दिया जाता है. यह ज्ञापन इसी के संदर्भ में था.
दूसरी तरफ बिहार की लड़कियों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी लड़कियों के लिए गिरधारी लाल साहू (कैबिनेट मंत्री के पति ) का विचार अपमानजनक है. इससे खासकर बिहार में आक्रोश है और बिहार महिला आयोग ने कार्रवाई करने की मांग की है. मंत्री रेखा आर्य के पति के खिलाफ जमशेदपुर के एडीजे -2 कोर्ट में आईटी एक्ट में भी शिकायत दर्ज किया गया है. सोशल मीडिया पर बात चर्चा में आने के बाद साहू ने इस बात को लेकर माफी मांगी है और कहा है कि वह अपने मित्र की शादी के संदर्भ में चर्चा कर रहे थे. इसके बावजूद उन्हें माफ नहीं किया जा सकता.
दोनों ही घटनाएं और इस तरह की अन्य जानी- अनजानी घटनाएं, वक्तव्य और विचार महिलाओं के पूरे वजूद को अपमानित करने वाले हंै. हम इसकी निंदा करते हैं.

जनप्रतिनिधि को महिलाओं के अपमान का साहस कहां से मिलता है!
हमारे देश में एक ओर तो महिलाओं को दुर्गा, काली, सरस्वती कहकर पूजा जाता है, उसका मान बढ़ाया जाता है, दूसरी ओर समाज में उसे जलील किया जाता है, उसके सम्मान की धज्जियां उड़ाई जाती है. आमजन की बात तो छोड़ दीजिए हमारे जन प्रतिनिधि भी इसमें पीछे नहीं. वे संस्कृति की दुहाई देते हैं,…
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