3 जनवरी को सावित्री बाई फुले की जयंती थी. सावित्री बाई फुले का जन्मोत्सव महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में मनाया गया. झारखंड की राजधानी रांची, जमशेदपुर, बिहार के पटना आदि सभी जगहों पर कई कार्यक्रम हुए. सावित्री बाई ने आज से 155 वर्ष पहले, जब स्त्रियों की शिक्षा का निषेध था, उन परिस्थितियों में स्त्री शिक्षा के लिए कठिन कार्य किया. सावित्री बाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका, नारी मुक्ति की अग्रदूत और ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती देने वाली क्रांतिकारी महिला का स्थान प्राप्त है.
19 वीं सदी का भारतीय समाज वर्ण-व्यवस्था और पितृसत्तात्मक रूढ़ियों से जकड़ा हुआ था. इन रूढ़ियों का विरोध सावित्री बाई फुले ने डट कर किया था. उन्होंने न केवल स्त्री शिक्षा के लिए संघर्ष किया, बल्कि बाल हत्या,  विधवा विवाह और ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और जाति व्यवस्था को भी चुनौती दी. इसके लिए उन पर पत्थर, गोबर फेंके गए और उन्हें धमकियां दी गईं. उन्हें हतोत्साहित और प्रताड़ित किया गया. लेकिन उन विरोधी परिस्थितियों में, धमकियों के बीच भी वे लड़कियों का स्कूल चलाती रही और अपने काम में लगी रहीं.
सावित्री बाई फुले, ज्योति बा फुले की पत्नी थीं. लेकिन इनकी पहचान केवल ज्योति बा फुले की पत्नी के रूप में ही नहीं थी, बल्कि उनका अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व था. उन्होंने ज्योति बा फुले के सामाजिक कार्यों में न केवल अपना सहयोग दिया बल्कि कई बार उनका पथ प्रदर्शन भी किया. महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव नामक छोटे से गाँव की सावित्री बाई फुले की शादी 1831 में 9 वर्ष की उम्र में 13 वर्षीय ज्योति बा फुले के साथ हुई. उस काल में आम तौर पर लड़कियों की शादी 6 से 7 वर्ष की उम्र में कर दी जाती थी. इस मिलन के बाद एक ऐतिहासिक दौर की शुरुआत हुई.
उस दौर में बाल विधवायेँ अगर बदकिस्मती से गर्भवती हो जाती थीं, तो उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर किया जाता था. फुले दम्पति ने इस करुण अमानवीय स्थिति से मुक्ति के लिए 28 जनवरी 1853 को अपने सहयोगी उस्मान शेख के यहाँ बाल हत्या प्रतिबंध गृह की स्थापना की, जिसमें दो चार वर्षों में ही सौ से अधिक विधवाओं की प्रसूति हुई. इस गृह की पूरी व्यवस्था सावित्रीबाई फुले करती थी. आगे चलकर पदमपुर में भी ऐसी बाल हत्या प्रतिबंधक गृह का निर्माण किया गया. इसके पीछे भी एक कथा हैं.
ज्योतिबा फुले ने काशीबाई नामक विधवा ब्राह्मणी को आत्महत्या करने से बचाया और अपने घर लाकर उसकी प्रसूती करायी. उससे उत्पन्न पुत्र को खुद गोद ले लिया और केवल एक काशीबाई की सहायता न करके उसके जैसी अनेकों काशिबाइयों की सहायता के लिए उन्होंने बाल ह्त्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की, ताकि न किसी विधवा को गर्भवती होने की स्थिति में आत्महत्या करनी पड़े, न उनके गर्भ में पल रहे बच्चे की असमय हत्या कर दी जाये.
स्त्री मुंडन रूढ़ी के खिलाफ भी फुले दम्पति ने संघर्ष की शुरुआत की. विधवा की लाश का भी मुंडन किये बिना दहन के लिए शुद्ध नहीं माना जाता था. ज्योतिबा ने इस प्रथा का पूरी शक्ति से विरोध किया.
उस समय ब्राह्मण स्त्री की यह स्थिति थी तो शुद्र स्त्री की स्थिति के बारे में अंदाज लगाया जा सकता है. जहां शूद्रों को ही मानव बनकर जीने का अधिकार नहीं है, वहाँ उनकी स्त्रियों की स्थिति तो और भी भयावह एवं अकल्पनीय थी. इन्हीं शुद्र स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाया फुले दंपति ने. इनके स्कूल से पढ़ी शूद्र स्त्रियों ने आगे चलकर स्त्रियों की स्थिति का हृदयविदारक चित्र अंकित किया है, जिनमें चैदह वर्षीया मुक्ता नामक मातंग समाज की लड़की का उल्लेख उस समय के साहित्य में आता हैं.
महात्मा फुले के स्त्री शिक्षा एवं शूद्राति शूद्रों की शिक्षा के पीछे एक दर्शन था. वह यह कि समाज परिवर्तन का एक प्रभावी साधन शिक्षा है. विद्यार्जन के महत्व का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा है –
बिना विद्या मति गई, बिना मति नीति गई
बिना नीति गति गई, बिना गति वित्व गया
बिना वित्व शूद्र दबा, इतना अनर्थ अविद्या से हुआ.
ज्योतिबा फुले ने लड़कियों के लिए जब पहले स्कूल की नींव डाली होगी, तो उन्हें कितने विरोधों का सामना करना पड़ा होगा और उस काल विशेष में स्त्री स्वतंत्रता की बात करना तो पागलपन ही माना गया होगा. लेकिन धीरे-धीरे उनके महान क्रान्तिकार्यों से लोगों का परिचय हुआ और प्रतिगामी हवाएँ कम से कमतर होने लगी थीं.
ज्योति बा फुले कि मृत्यु 1890 में होने के पश्चात नवजागृत समाज पर अंधकार छाने का डर बना, लेकिन उतनी ही जिम्मेवारी, कुशलता से सावित्रीबाई ने इस अधूरे कार्य को पूरा करने का संकल्प लिया और उनकी मृत्यु भी इसी संकल्प की एक मिसाल है. वो प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए प्लेग रोग से ग्रसित हो गई और 10 मार्च 1897 को भारतीय समाज में स्त्रियों के लिए एक नया आदर्श स्थापित करते हुए निर्वाण को प्राप्त हो गई.

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