नये साल के पहले महीने में ही कई ऐसी घटनाई घटीं जो एक बार फिर यह सोचने पर विवश करती हैं कि समय आगे बढ़ रहा है या पीछे की ओर जा रहा है. समय के साथ मनुष्य की सोच में बदलाव आता है. उसके ज्ञान में वृद्धि होती है और वह दिन पर दिन अधिक सभ्य बनता है. लेकिन भारत में महिलाओं के साथ जिस तरह का व्यवहार हो रहा है उससे लगता है कि भारत के लोग एक बार फिर उन्नीसवीं सदी में पहुंच गये हैं.
पहली घटना उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की है जो बारह जनवरी को घटित हुई. एक साल पहले एक मुस्लिम लडका जो दिल्ली में पढ़ता है, उसने एक हिन्दू लडकी से वहीं पर रजिस्ट्री मैरेज कर ली. दोनों के माता-पिता की इस शादी में सहमति थी. लड़की के माता पिता शादी की रजिस्ट्री के समय गवाह भी बने. बारह जनवरी को लड़के के माता पिता ने बहु के स्वागत में शाहजहांपुर में एक प्रीतिभोज देना चाहा. इसके लिए बकायदा एक मैरेज हॉल ठीक किया गया और वलीमा के कार्ड भी छपे. इसकी खबर वहां के हिन्दू संगठन को लग गयी. अपने शौर्य प्रदर्शन का उनको एक मौका मिल गया. वहां के पुलिस को हिन्दू संगठन के इस तैयारी का पता चल गया. इसलिए शाम में ही वे उस हॉल में पहुंच गये और पार्टी की तैयारियों को रुकवा दिया और कह दिया कि परिस्थितियों को देखते हुए अब वहां बहूभात का कार्यक्रम नहीं हो सकता है. उन्होंने हॉल का दरवाजा बंद करवा दिया. उसके बाद हिन्दू संगठन की एक भीड वहां आई. दरवाजा बंद होने के कारण वे तोड फोड करने से वंचित हो गये. लेकिन उन्होंने जोर शोर से भाषण बाजी की और कहा कि हिन्दू लड़की का विवाह एक मुस्लिम लड़के के साथ जोर जबरदस्ती कराया गया है. लड़की का धर्मांतरण कराया गया है. हिन्दू धर्म का अपमान वे सह नहीं सकते हैं. पुलिस को कहा गया कि एफआइआर करे और अपराधी को सजा दी जाए.
दूसरी घटना मुरादाबाद की है. वहां एक हिन्दू लड़की अपने पडोसी मुसलमान लड़के से प्रेम करती थी. वह एक शिक्षिका थी और लड़का भी काम करता था. लड़की उससे शादी करना चाहती थी. लड़की के माता-पिता को यह स्वीकार्य नहीं था. इसलिए लड़की के भाइयों ने दोनों को मार कर फेंक दिया. यह घटना 19 जनवरी की है और उत्तर प्रदेश की है.
तीसरी घटना बिहार के पटना में 23 जनवरी को घटी. फुलवारी शरीफ के एक खेतिहर मजदूर की बेटी अपने नानी के घर में रह कर पढ़ती थी. उसे दसवीं की परीक्षा देनी थी. उसे अपनी नानी के घर से अपने माता पिता के पास आने जाने में उस सड़क से गुजरना पड़ता था जिस सड़क पर वहां के पार्षद का घर था. पार्षद का बेटा उस लड़की को छेडा करता था और उससे बात करने की कोशिश करता था. उस लड़की को यह सब अच्छा नहीं लगता था. वह अपने तरीके से अपनी अनिच्छा जाहिर भी करती थी. 23 जनवरी के दिन भी जब वह लड़की उस सडक से गुजर रही थी तो लड़के ने उसे रोकना चाहा. दोनों में बहस हुई और अन्त में उस लड़के ने एक बोतल में रखा पेट्रोल उस पर छिडक कर आग लगा दी. आस पास के लोगों ने किसी तरह आग बुझा कर उसे आस्पताल पहुंचाया. लेकिन लडकी बची नहीं. मर गयी.
चैथी घटना है मणिपुर की. एक मैतेयी युवक जो नेपाल में काम करता था, क्रिसमस के समय मणिपुर आया और अपनी कुकी मंगेतर से मिलने उसके घर गया था. कुछ बदमाश उसे पकड़ कर ले जाते हैं और गोली मार देते हैं. मारने के दौरान उसका वीडियों बनाते हैं और उसको सोशल मीडिया पर प्रसारित भी करते हैं. वीडियों में दिखता है कि वह युवक अपने प्राणों की भीख मांग रहा है और वे उसे निर्ममता से मार देते हैं.
हर घटना के बाद प्रशासन की ओर से आश्वासन मिलता है कि घटना की जांच होगी और अपराधियों को सजा मिलेगी. जरूरत पडे तो एसआइटी, एनआइटी को गठित कर जांच होगी.
ये चार घटनायें केवल उदाहरण के लिए हैं. इस महीने में और भी कई घटनाएं घटी हैं और आगे भी घटित होंगी. इन घटनाओं पर गौर करें तो हम पाते हैं कि इन चारो घटनाओं में एक सामान्य बात है, और वह है ये चारो घटनाएं बीजेपी शासित राज्यों में घटित हुई हैं. अंतरधर्म विवाह इसका कारण है और इसका विरोध करने वाले हिंदू संगठन राज्य पोषित और राज्य संरक्षित है. और इसका अंतिम परिणाम औरत को ही भुगतना पड़ता है. वह अपमानित होती है, प्राण देती है.
ये घटनाएं यह भी बताती हैं कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देकर जो दल गद्दी पर आसीन हुआ, वह जीवित रहकर पढ़ लिख रही लड़की को कोई सुरक्षा नहीं दे सकती. लड़कियों को बार बार यह बताया जाता है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग वे नहीं कर सकती हैं, क्योंकि समाज में उन्हें बराबरी का अधिकार ही नहीं प्राप्त है. वे अपनी इच्छा से कपडे पहन सकती हंै, न घूम फिर सकती हैं और न अपनी इच्छा से अपना जीवन साथी ही चुन सकती है.
शाहजहांपुर में पुलिस चाहती तो हिंदू संगठन को रोक कर लड़की का साथ देती. इसके विपरीत वह कार्यक्रम को ही रोक देती है और हिंदू संगठन को यह आश्वासन देती है कि वह इसकी जांच करेगी. इसका अर्थ यह हुआ कि दो वयस्क स्त्री पुरुष अपनी इच्छा से शादी नहीं कर सकते हैं, जबकि मैरेज रजिस्ट्री में कोई अडचन नही थी. मुरादाबाद में तो माता पिता को बोटी को बचाने से ज्यादा हिन्दू धर्म को बचाना महत्वपूर्ण लगा. पुरुष अहंकार और दर्प को नकारने वाली लडकी को तो पटना में अपनी जान गंवानी पडी. कुकी और मैतेयी समुदाय के बीच फूट जलने वाली ताकत तो राज्य ही थी जिसका मूल्य वहां की औरते सबसे ज्यादा चुका रही हैं.
कोई भी धर्म हो वह हमेशा प्रेम, अहिंसा और सच्चाई का पाठ पढ़ाता है. केवल बहुमत में होने के कारण हिंदूवादी इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं तो इसका असर सबसे ज्यादा इस समाज की महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है.

क्या हम 19 वीं सदी में लौट रहे हैं!
नये साल के पहले महीने में ही कई ऐसी घटनाई घटीं जो एक बार फिर यह सोचने पर विवश करती हैं कि समय आगे बढ़ रहा है या पीछे की ओर जा रहा है. समय के साथ मनुष्य की सोच में बदलाव आता है. उसके ज्ञान में वृद्धि होती है और वह दिन पर दिन…
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