इस तथ्य और इस सवाल के उत्तर में भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति को आँका जा सकता है! संयोग से बसंत आ गया। 24 जनवरी को बसंत पंचमी थी, यानी बसंत ऋतु का आगमन। बसंत केवल एक ऋतु नहीं, बल्कि नव जीवन , उल्लास और नई शुरुआत का ऐलान है। कुछ दिन बाद होली का त्योहार आएगा, जिसे भारतीय संस्कृति के स्वयंभू रक्षक ‘वैलेंटाइन डे’ का विकल्प भी बताते हैं।
मगर स्त्री-पुरुष के बीच नैसर्गिक आकर्षण को स्वाभाविक माने बिना और नैतिकता के नाम पर तरह -तरह के बंदिशों के रहते ऐसा दावा एक पाखंड ही है! स्त्री-पुरुष गैरबराबरी के रहते रिश्तों में सहजता संभव ही नहीं है। ऐसे समाज में बसंत हो या कोई मौसम, ‘उमंग’ पुरुष के लिए आरक्षित है। कोई युवती उम्र और मौसम के मुताबिक खुशी मनाना चाहे, तो वह बदचलन मान ली जाती है और उसके साथ किसी को कुछ भी करने की छूट मिल जाती है। इसलिए होली मूलतः मर्दों का त्योहार बन कर रह गया है!
समाज का यही स्त्री विरोधी चरित्र गालियों में दिखता है। स्त्री को देवी का दर्जा तो दे दिया गया है, प्रतिमा बना कर देवियों की पूजा भी होती है, मगर हाँड़-मांस की स्त्री बस सेवा करने, ‘सुख’ देने और वंश वृद्धि के लिए होती है। वंश, यानी पुरुष संतान! कन्या को जन्म देने वाली स्त्री का कोई महत्व नहीं।
यह स्थिति एक हद तक बदली जरूर है, मगर बदलाव की रफ्तार बहुत धीमी है, इतनी धीमी कि बेमानी है। संविधान अपनी जगह, लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा मानता है कि स्त्री को पैत्रिक संपत्ति पर अधिकार नहीं मिलना चाहिए। व्यवहार में मिलता भी नहीं। स्त्री अपने आप में पुरुष की संपत्ति है- ‘सामान’ है, जिसे खरीदा-बेचा और किसी को ‘दान’ में दिया जा सकता है।
वैसे स्त्री घर की ‘इज्जत’ भी है, इसलिए किसी दुश्मन (पुरुष) से बदला लेने के लिए उसकी मां-बहन को अपमानित करने की परंपरा है। इसीलिए अधिकतर गालियां औरत को लेकर हैं। हर स्त्री को मां और बहन मानने की परंपरा का सच यह है कि अधिकतर पुरुष किसी और की मां-बहन से अंतरंग, रिश्ता बनाने को लालायित रहता है, इसका इजहार भी करता है!
ऐसा इसलिए है कि स्त्री को हमारे समाज में दोयम माना  जाता है, उसकी कोई स्वतंत्र हैसियत नहीं होती। हमारे शास्त्रों में भी लिखा है- हर स्त्री को बचपन में पिता के अधीन, विवाह के बाद पति के अधीन और विधवा हो जाने पर पुत्र के अधीन रहना चाहिए! कम या अधिक हर धर्म में स्त्री विरोधी नियम और प्रावधान हैं! ऐसे में मां-बहन की गाली आम है तो क्या आश्चर्य!

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