हर दिन अखबार में महिलाओं के बलात्कार की एक दो घटनायें अवश्य छपती हैं. बलात्कार पीडिता एक बच्ची हो सकती है या एक नाबालिग लड़की. या फिर एक युवा औरत या प्रौढ़ महिला. ये खबरे कई स्तरों की होती है. बलात्कार की घटना कब घटी और कैसे घटी का विवरण. कभी-कभी पुलिस के हवाले से खबर आती है कि घटना की जांच हो रही है या अपराधी पकडा गया है और आगे की कार्रवाई हो रही है. उसके बाद उस घटना के आगे की कोई खबर नहीं मिलती है.
बलात्कार की घटनाए ही नहीं एसिड फेंकने की खबरे या किसी प्रेमी के प्रेम को ठुकराने वाली लड्की काी हत्या करने जैसे मामले भी होते हैं. कई वर्षों के बाद अखबार के किसी कोने मे यह खबर छपती है कि फलाने वर्ष में हुई बलात्कार की घटना के अपराधी को आजीवन कारावास हो गया है या बीस वर्ष की सजा हुई. यह खबर न पाठक के लिए महत्व का होता है न पीडिता के लिए. पाठक तो उस घटना को भूल चुके होते हैं और पीडिता तो समाजिक प्रताडना को झेल चुकी होती है. यह है हमारे समाज की अमानवीयता और संवेदनहीनता.
यही बात उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी कहा है. उनका कहना था कि महिला हिसा या प्रताडना से संबंधित जितने भी मामले आते हैं, उनका फैसला स्टीरियोटाइप होता है. क्योंकि वे फैसले मशीनी तरीके से बिना किसी संवेदना के दिये जाते हैं उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा है कि जज तथा वकील ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की हैंड बुक (सहायक पुस्तिका) से मदद लेते हैं. यह पुस्तिका उन्हें सूक्ष्मता से अध्ययन कर मामलों के बहस करने में या फैसला देने मैं मददगार होती हैं. लेकिन ये बहस भावनाशून्य होकर मशीनी तरीके से ऐसे किये जाते हैं कि कोर्ट में उपस्थित महिला का एक बार फिर अपमान होता है. वर्षों बहस के बाद जो फैसला आता है वह पीडिता के लिए कोई उपयोग का नहीं होता है. यह पुस्तिका 2023 में सुप्रीम कोर्ट के प्रयास से छपाई गयी थी. उस समय मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड थे. कहा जाता है कि उन्होंने हावर्ड से प्रभावित होकर यह पुस्तिका छपवाई .
उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि किसी नाबालिग लड़की के वक्ष को पकड़ने और उसके पैजामे के नाडे को खोलने मात्र से ही यह साबित नहीं होता है कि इसका उद्येश्य बलात्कार करना था. इसी आधार पर अपराधियों को छोड़ दिया गया. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि किसी नाबालिग लड़की को उसके वक्ष पकडे हुए उसके पैजामे का नाडा खोलना और पुलिया के नीचे ले जाना तो वैज्ञानिक जांच के हिसाब से बलात्कार नहीं कहा जा सकता. लेकिन मानवीय संवेदना के साथ सोचा जाय तो निश्चित रूप से यह बात समझ में आयगी कि यह बलात्कार के पूर्व की तैयारी है जो एक अपराध है. इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने उक्त ‘सहायक पुस्तिका’ का जिक्र करते हुए कहा था कि वह लैंगिक हिंसा की पडताल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण देता है और अपराध के सूक्ष्म परीक्षण मैं सहयोग तो करता है, लेकिन उसमें मानवीय पक्ष की कोई अहमियत नहीं होती है. फलतः स्त्री के साथ होने वाले अपराधों में उचित न्याय नही मिल पाता.
सुप्रीम कोट ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्याय संस्था से अनुरोध किया है कि वह कानून के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों तथा वरीय वकीलों को लेकर एक समिति का घटन करे और महिला उत्पीडन की विभिन्न पहलुओं पर विचार करें और इसके संबंध में एक स्पष्ट निर्देश तय करें. एक बार इसका एक खाका तय हो जाय तो इसे भावी जजों और वकीलों के प्रशिक्षण में उपयोग किया जायगा.

कोर्ट बहस में स्त्री के प्रति संवेदना का अभाव
हर दिन अखबार में महिलाओं के बलात्कार की एक दो घटनायें अवश्य छपती हैं. बलात्कार पीडिता एक बच्ची हो सकती है या एक नाबालिग लड़की. या फिर एक युवा औरत या प्रौढ़ महिला. ये खबरे कई स्तरों की होती है. बलात्कार की घटना कब घटी और कैसे घटी का विवरण. कभी-कभी पुलिस के हवाले से…
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