हमारे देश और समाज में मर्दो के आपसी लड़ाई झगड़े तो छोड़िए, उनकी आम बातचीत में भी औरतों के लिए गाली आम बात है, ऐसे में औरत को देवी बना कर पूजने या कन्या-पूजन की प्रथा हास्यास्पद ही लगती है। फिर भी हमारे देश में यह होता रहा है और इसे हम स्त्री की इज्जत करना मान कर गर्व भी करते हैं! लेकिन यह असल में एक पाखंड ही है।
इसी महान देश में ‘सती’ का महिमा गान होता है, सती को आदर्श बताया जाता है। हर स्त्री से ‘सती’ होने की अपेक्षा की जाती है, जबकि हम जानते हैं कि ‘सती प्रथा’ के नाम पर पति की मृत्यु के बाद उस स्त्री को पति की चिता के साथ जलना पड़ता था या बहुधा जबरन जला दिया जाता था. इसी कारण ‘सुहागन’ का महिममंडन होता है’ और विधवा प्रताड़ित होती है, उपेक्षित रहती है। डायन प्रथा के कारण भी औरतों को जलाने की घटनाएं आज भी हो रही हैं!
आज जिस ‘मनुस्मृति’ को हम पर थोपने की बात हो रही है उसमें आरंभ से अंत तक औरतों को प्रताड़ित करने की बातें लिखी हुई हैं। औरत को ‘भोग्या’ तक कहा गया है। औरतें बच्चा पैदा करने की मशीन मात्र हैं। उसमें भी अगर बेटा नहीं पैदा कर सकती तो पति को दूसरी, तीसरी, चैथी शादी करने का भी हक है ।
जिस ‘रामायण’ और रामकथा को हमारे यहां पूजनीय माना जाता है, उसमें राजा दशरथ की तीन तीन पत्नियां थीं। बनवास के दौरान जब शुर्पनखा राम से प्रणय निवेदन करती है वे उसे लक्ष्मण के पास यह कहकर भेज देते हैं कि मैं तो शादी-शुदा हूं, तुम मेरे छोटे भाई के पास अपना निवेदन लेकर जाओ। क्या लक्ष्मण शादी-शुदा नहीं थे? क्या यह राम नहीं जानते थे? फिर राम ने ऐसा क्यों कहा? उसका मजाक बनाने के लिए?
अगर आप किसी के प्यार की कदर नहीं कर सकते तो कम-से-कम उसका मजाक तो मत बनाइये। और लक्ष्मण ने क्या किया, उसका नाक-कान काट लिया। हमारे यहां नाक काटना मुहाबरा है, जिसका अर्थ होता है अपमान करना। तो लक्ष्मण को शुर्पनखा का अपमान करने का हक किसने दिया? मानें या न मानें, ऐसा करने के लिए उन्हें राम ने प्रेरित किया। और यहीं से राम- रावण युद्ध की नींव पड़ी और इसके लिए सीता को मोहरा बनाया गया।
राम महान थे. पिता की आज्ञा के कारण उन्होंने सत्ता का त्याग किया, जो बहुत बड़ी बात है. उनके कई आदर्शोन्मुख कार्यों के कारण उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की उपाधि दी गई है, यानी पुरुषों में उत्तम। लेकिन सवाल यहां उठता है कि अगर कोई पति आधी रात को अपनी गर्भवती पत्नी को एक धोबी के कहने पर या उसकी आड़ में बिना पत्नी को कुछ बताए उसे जंगल में छोड़ दे, उसे कैसे ‘पुरुषोत्तम’ कहा जा सकता है?
राम ने अपने गुरु के कहने पर शम्बूक को सिर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि वह शूद्र था और अपने जैसे और लोगों को मुफ्त में शिक्षा दे रहा था। इतना ही नहीं, बाली को मारने के लिए भी राम ने छल का सहारा लिया। फिर उन्हें किस आधार पर ‘पुरुषोत्तम’ कहा गया, यह विचारणीय है।

क्या राम सचमुच ‘पुरुषोत्तम’ थे?
हमारे देश और समाज में मर्दो के आपसी लड़ाई झगड़े तो छोड़िए, उनकी आम बातचीत में भी औरतों के लिए गाली आम बात है, ऐसे में औरत को देवी बना कर पूजने या कन्या-पूजन की प्रथा हास्यास्पद ही लगती है। फिर भी हमारे देश में यह होता रहा है और इसे हम स्त्री की इज्जत…
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