महिलाओं पर होने वाले सामाजिक, आर्थिक और यौनिक अत्याचारों के बढ़ते ग्राफ के बीच सुप्रीम कोर्ट का मासिक धर्म स्वास्थ्य संबंधित फैसला स्वागत योय है और कई वर्जनाओं को तोड़ने वाला है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे सरकारी और निजी स्कूलों की छात्राओं को निःशुल्क ‘ऑस्को-बायो-डीग्रेडेबल’’ सैनिटरी पैड उपलब्ध कराये। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा नहीं होता है और आरटीई की धारा 19 के मानकों का पालन नहीं किया गया तो उनकी मान्यता रद्द की जायेगी.
ज्ञात हो कि 28  मई 2014 को पहली बार स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ग्रामीण क्षेत्रों में मासिक धर्म स्वच्छता अभियान शुरू किया था। 2025 का अंतरराष्ट्रीय थीम- पीरियड फ्रेंडली वल्र्ड रखा गया था.
हम सभी जानते हैं कि मासिक धर्म लड़कियों में हर महीने होने वाला नियमित रक्त स्त्राव है. यह महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य चक्र का एक हिस्सा है.
इस अभियान का उद्देश्य है — माहवारी से जुड़ी सामाजिक धारणाओं को खत्म करना, शरीर के बारे में सही जानकारी देना ताकि लड़कियां अपनी पढ़ाई जारी रख सके और आत्मविश्वास महसूस कर सके. यह निर्देश (आदेश) मासिक धर्म के प्रति रूढ़ मान्यताओं को तोड़ने का प्रयास है. समाज आज भी इसको लेकर झिझक महसूस करता है. इस पर कोई बात नहीं करना चाहता. इसे गंदा और अपवित्र और लज्जाजनक माना जाता है. महिलाएं भी गलत धारणा की शिकार होती हैं. वे इसको लेकर हीन भावना से ग्रसित और सिकुड़ी- सिमटी रहती हैं.
वैसे, विगत वर्षों में थोड़ा सुधार आया है. अब पहले जैसी चुप्पी नहीं रही. विज्ञापन, फिल्म , स्वमंसेवी संस्थाओं और कुछ सरकारी प्रयास से झिझक टूटी है.
संविधान का अनुच्छेद 21 हमें जीवन का अधिकार देता है. सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को जोड़ते हुए इसे लैंगिक न्याय के लिए उठाया जाने वाला कदम माना है. इसके साथ ही सामाजिक सोच बदलने की दिशा में यह भी निर्देश दिया है कि न केवल छात्रों को नहीं, बल्कि पुरुष शिक्षकों और छात्रों के बीच भी मासिक धर्म स्वच्छता के प्रति जागरूकता लाने की दिशा में कदम बढ़ाया जाए.
वैसे, कुछ सरकारी स्कूलों विशेष कर आवासीय बालिका विद्यालयों में पहले से ही छात्राओं को विद्यालय की ओर से पैड देने की व्यवस्था है, लेकिन अधिकांश स्कूल (सरकारी और निजी) इस सुविधा से वंचित रहते हैं। स्वाभाविक तौर पर ऐसी स्थिति में छात्राएं विशेष दिनों में स्कूल जाने से कतराती है। इससे निजात पाने एवं जीवन के अधिकार को सहजता से व्यावहारिक रूप से स्थापित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन माह का समय निर्धारित किया है. इसके साथ ही शौचालय निर्माण एवं स्थिति पर भी रिपोर्ट बनाने का निर्देश दिया है.
कैसी विडंबना है कि जिन विषयों पर घर-परिवार और राज्य के स्थानीय निकायों को काम करना चाहिए उसके लिए सुप्रीम कोर्ट को निर्देश देना पड़ता है. आदेश का पालन राज्य कितनी मुश्तैदी से करता है यह तो वक्त ही बताएगा. इतना जरूर कहा जा सकता है कि उसके निर्देशों का पालन होने से एक जागरूकता आएगी और लड़कियों को पीरियड फ्रेंडली वल्र्ड मिलेगा.

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